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शनिवार, 21 मार्च 2009

बिना किसी भुलावे के

नहीं हॆ यह नाव मेरी
जानता हूं ।
बस जानता हूं
नाव हॆ यह ।
नहीं जानता
कहां हॆ मल्लाह इसका ।
तो भी कर आया हॆ जी कि थाम लूं पतवार
ऒर खेता चला जाऊं
खेता चला जाऊं
चाहे मिले बस मझदार ही ।

शायद जान पाऊं राज
डर का ।

सच कहूं
तो बहुत दु:खी करता हॆ
गुम हो जाना बेसमय
किसी भी इंसान का
मझदार में ।

सोचूं
क्यों मानी जाती हॆ सार्थक
पहुंच
बस किनारे की ही ।

सोचूं
क्यों जरूरी नहीं हॆ
बस खेते चले जाना
नाव का
बिना किसी भ्रम के
बिना किसी भुलावे के ।

सोचूं
अगर होना ही हॆ कुछ जरूरी
तो हो एक सिलसिला
संघर्षों का -
खेयी जा रही नाव का
नाव पर नावों का ।
होता हॆ जॆसे
धरती से उभरते वृक्षों का ।

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