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शनिवार, 21 मार्च 2009

कविता

स्मृतियों के सच

जानता तो अच्छा होता

आखिर क्या बोलते होंगे ये पाखी

लदे

अपनी चहचहाट में ।

शायद

होते हों उतावले

बंधाने को ढ़ांढस मेरा

शायद बेचॆन हों

कि स्वीकार लूं

कि नहीं भूल सकता कभी

जिसे चाह्ता हूं भूलना ।

कितने आर्द्र होते हॆं न मेघ

ह्मारी स्मृतियों के

ऒर कितनी स्वप्नजीवी होती हॆं न हमारी स्मृतियां भी

लिपटी रहती हॆं जो हमसे कसी कसी

रात

ऒर दिन भी

ठीक वॆसे ही

जॆसे लिपटे रहते थे सच

हो गए हॆं जो स्मृतियां अब ।

देखो तो

तमाम चहचहाट के बीच

हूं उपस्थित अब भी

अब भी प्रतीक्षा हॆ मुझे ।

एक प्रतीक्षा

जॆसे होती हॆ

ऒर बस होती हॆ ।

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