सोमवार, 7 मार्च 2011

२१वीं सदी का बाल-साहित्य : विभिन्न भाषाओं से अनुवाद के विशिष्ट संदर्भ में

अनुवाद की बात करना प्राय: तब जायज माना जाता हॆ जब मूल महत्त्वपूर्ण ऒर समृद्ध हो । भारतीय भाषाओं की बात करें तो नि:संदेह बंगला ऒर मराठी जॆसी भाषाओं के समृद्ध ऒर मह्त्त्वपूर्ण बाल-साहित्य की भांति आज हिन्दी का बाल-साहित्य भी मह्त्त्वपूर्ण ऒर समृद्ध हे । इस नाते यदि हिन्दी-बाल-साहित्य के संदर्भ में भी अनुवाद की दृष्टि से विचार किया जाए तो तर्कयुक्त ही कहा जाएगा । लेकिन बहुभाषी भारत के संदर्भ में तो मेरे विचार से सभी भाषाओं के बाल-साहित्य के एक दूसरे की भाषा में अनुवाद की आवश्यकता हे । बावजूद इसके कि कई भाषाएं ऎसी भी हॆं जिनसे या जिनमें हिन्दी बाल-साहित्य का अनुवाद करना कोई आसान काम नहीं हॆ । मसलन र. शॊरिराजन के अनुसार शब्द, वाक्य-रचना, व्याकरण आदि की भिन्न्ता के कारण अनुवाद की दृष्टि से हिन्दी ऒर तमिल में आदान-प्रदान सरल नहीं हॆ । यह मत उन्होंने बहुत पहले मधुमती (१९६७) के बाल विशेषांक में प्रकट किया था । आज कमोबेश सभी भारतीय भाषाओं में बाल-साहित्य की भी प्रकाशित सामग्री उपलब्ध हॆ । यदि हम चाहते हॆं कि हमारे देश की एक बड़ी अनिवार्य जरूरत की तहत भावनात्मक एकता के स्वरूप की महत्तवपूर्ण जानकारी ऒर उसके सच्चे संस्कार हमारे बच्चों में सहज ऒर पुख्ता ढ़ंग से घर कर लें तो नि:संदेह यह कार्य बाल-साहित्य के आदान-प्रदान से ही संभव हो सकता हॆ । आज न बड़ों के ऒर न ही बालकों के दायरे संकुचित रह गए हॆं, ऎसी स्थिति अपेक्षित भी नहीं हॆ । हम वॆश्विक होने की होड़ में हॆं । सूचनाओं ऒर जानकारियों को भण्डार हमारे सामने खुला पड़ा हॆ । मूल्यों की कोई एक परिभाषा नहीं रह गई हॆ । बिना सोचे-समझे अपनी-अपनी परिभाषाओं से चिपके रहना कोई अच्छी राह नहीं मानी जाती । हालांकि मूल्यविहीनता का मूल्य किसी को स्वीकार नहीं हॆ -बच्चों की दुनिया में तो एकदम नहीं । लेकिन मूल्यों का आरोपण या उनका उपदेशीकरण भी आज बच्चों तक को ग्राह्य नहीं हॆ । अत: बाल-साहित्य सृजन, आज के साहित्यकार के लिए एक बड़ी चुनॊती भी हॆ । अत: बालक के एक बड़े ऒर व्यापक परिवेश की सोच के बिना किसी भी भाषा का बाल-साहित्य सम्पूर्ण नहीं माना जाएगा । ऒर इतने बड़े देश में, इतनी भाषाओं के बच्चों के संदर्भ में यह कार्य अनुवाद के माध्यम से बखूबी संभव हो सकता हॆ । अनुवाद हर भाषा को अपने-अपने क्षितिज व्यापक करने का अवसर प्रदान करता हॆ । आदान-प्रदान हर हाल भारतीय ऒर वॆश्विक बाल-साहित्य के विकास में मदद करता हॆ । अगले पड़ावों के रूप में भारतीय बाल-साहित्य ऒर वॆश्विक बाल-साहित्य की प्रतिष्ठापना की जा सकती हॆ । हम विश्व के बाल-साहित्य के परिदृष्य में दृढ़ पांव जमा सकते हॆं । ऒर ऎसा करके हम मानवीयता से भरपूर वॆश्विक बालक ऒर उसके साहित्य को प्राप्त कर सकते हॆं । स्पष्ट हॆ कि यही वह राह हॆ जो हमें मानव ऒर विश्व को बचाए रखने में कारगर ढंग से मदद कर सकती हॆ । इस संदर्भ में मॆं अपनी पहले ही से बनी एक राय ज़रूर बांटना चाहूंगा कि विश्व तक जल्दी से जल्दी पहुंचने के लिए हिन्दी को अन्य भारतीय भाषाओं का द्वार बनाना ज़्यादा व्यावहारिक होगा । अर्थात सभी भारतीय भाषाओं के बाल-साहित्य का यदि हिदी में अनुवाद उपलब्ध कराने की व्यवस्था कर ली जाए तो विदेशी भाषाओं के संदर्भ में केवल एक भारतीय भाषा ’हिन्दी’ के माध्यम से उन भाषाओं में अनुवाद के माध्यम से पहुंचना बहुत सरल तो होगा ही, प्रमाणिक भी होगा क्योंकि हमारे देश का एक एक हिस्सा सांस्कृतिक दृष्टि से तो एक हॆ ही । सच तो यह हॆ कि जब तक स्रोत ऒर लक्ष्य भाषाओं में सीधे-सीधे अनुवाद करने वालों का अभाव हे तब तक किन्हीं भी दो भारतीय भाषाओं में भी बाल-साहित्य की सच्ची पहुंच के लिए ’हिन्दी’ का माध्यम सबसे ज़्यादा उपयुक्त होगा न कि अंग्रेजी का । कम से कम 21 वीं सदी में तो हमें इस तथ्य को स्वीकार कर ही लेना चाहिए । आज इस बात की भी खासी ज़रूरत हॆ कि हिन्दी ऒर भारतीय भाषाओं के बाल साहित्य को दोयम दर्जे का मानने वाले से सीधी टक्कर ली जाए । जयप्रकाश भारती जॆसे साहित्यकार इस दिशा में आदर्श कहे जाएंगे ।




यहां मॆं बाल-साहित्य की पहचान से संबद्ध पहले ही से बना अपना यह मत भी बता दूं कि बाल-साहित्य के अन्तर्गत मॆं केवल रचनात्मक बाल-साहित्य अर्थात कालात्मक अनुभूति जन्य बाल-साहित्य को ही स्वीकार करता हूं न कि अध्ययन, शोध, जानकारी अथवा तथ्यजन्य बालोपयोगी बाल-साहित्य को । ऒर जिसे मॆं बाल-साहित्य के अन्तर्गत मान रहा हूं उसी के अनुवाद का मसला कठिन ऒर चुनॊतिपूण होता हॆ । यही वह साहित्य होता हॆ जिसके अनुवाद का मतलब एक भाषा के शब्दों को दूसरी भाषा के शब्दों में रख देना मात्र नहीं होता । यहां आत्मा का अर्थात संस्कृति, पाठ आदि सब का अनुवाद करना होता हॆ । ऒर यह भी कि अनुवाद के माध्यम से एक भाषा मे लिखी रचना अन्य भाषा में पहुंचकर भी रचना ही लगनी चाहिए । अर्थात दूसरी भाषा की प्रकृति के एकदम अनुकूल - अनूदित कविता पहले कविता होनी चाहिए । यह अनुवादक की दोनों भाषाओं पर अधिकार मात्र से संभव नहीं होता बल्कि भाषाओं से जुड़े जीवन ऒर संस्कृति आदि के गहरे अनुभवात्मक ज्ञान से अधिक संभव होता हॆ । अनुवाद को लेकर विद्वानों में जो शब्दश: अथवा कलात्मक या मुक्त अनुवाद की बहस हॆ, उसके संदर्भ में मेरा निवेदन तो यही हॆ कि जहाँ तक रचनात्मक बाल-साहित्य के अनुवाद की बात हॆ, संतुलन करते हुए कलात्मक या मुक्त अनुवाद की राह पकड़नी चाहिए । पीताम्बार पबिल्शिंग कम्पनी प्रा० लि० द्वारा प्रकाशित स्लोवाकिया की लोक-कथाओं के रस में पगी दिलचस्प कहानियों के अनुवाद की पुस्तक मॆत्री का पुल के सम्पादकीय में जयप्रकाश भारती का कहना हॆ -"डॉ. शारदा यादव ने कथाओं का ऎसा अनुवाद किया हॆ कि अनुवाद नहीं लगता ।" 2008 में साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित ऒर प्रीति पंत द्वारा अनूदित "उरुगुवाई बाल कहानियां" पढ़ते समय मुझे भारती जी द्वारा बताए गए गुण के भरपूर दर्शन हुए । उदाहरण के लिए मॆं एक कहानी गंजा तोता का ज़िक्र कर सकता हूं । तोते का नाम हॆ -पेद्रीतो । अनुवाद देखिए - "पेद्रीतो उन बच्चों के साथ खूब समय बिताता था । वे उससे इतना कुछ कहते थे कि वह भी उनकी तरह बोलना भी सीख गया । वह कहता, "मिट्ठू राम राम अहा मीठी मिर्ची ! पेद्रीतो का प्याला!" वह ऒर भई बहुत कुछ कहता था, जो कि बताया नहीं जा सकता हॆ, क्योंकि तोते भी बच्चों की ही तरह बुरी बातें आसानी से सीख जाते हॆं । " स्पष्ट हॆ कि यहां अनुवाद करते समय अनुवादिका ने ध्यान रखा हॆ कि हिन्दी में अनूदित इन कहानियों के पाठक अधिकतर हिन्दी के जानकार भारतवासी होंगे । अत: राम राम आदि वाली सुखद ऒर ज़रूरी छूट ले ली हॆ ऒर कृत्रिम भाषा-परिवेश से अनुवाद को बचा लिया हॆ ।

21 वीं सदी को ध्यान में रख कर कहा जाए तो भारत की सहवर्ती भाषाओं में बाल-साहित्य के आदान-प्रदान की स्थिति बहुत उत्साहवर्द्धक नहीं हॆ । साहित्य अकादमी, नेशनल बुक ट्रस्ट, चिलड्रन बुक ट्रस्ट जॆसी समर्पित ऒर सक्षम संस्थाओं के बावजूद । कहने को अनेक भारतीय भाषाओं में अनूदित रचनाएं मिल जाएंगी लेकिन संख्या की दृष्टि से अनुवाद बहुत ही कम कृतियों के हॆं । विदेशॊ बाल-साहित्य के अनुवाद भी भारतीय भाषाओं में प्रकाशित हॆं पर वे भी संख्या की दृष्टि से आशाप्रद नहीं हॆं । विधाओं की दृष्टि से देखा जाए तो ज़्यादातर अनुवाद गद्य विधाओं में रची रचनाओं के हुए हॆं, ऒर उनमें भी अधिकतर ज़ोर लोककथाओं पर रहा हॆ । इतिहास पर नज़र मारी जाए तो पाएंगे कि "हिन्दी बाल-कहानियों का उदय भारतेन्दु युग से माना जाता है। इस काल की अधिकांश कहानियाँ अनूदित हैं। इसके लिए वे संस्कृत की कहानियों के लिए आभारी हैं। सर्वप्रथम शिवप्रसाद सितारे हिन्द ने कुछ मौलिक कहानियाँ लिखीं, इनमें ‘राजा भोज का सपना’ ‘बच्चों का इनाम’ तथा ‘लड़कों की कहानी’ का उल्लेख किया जा सकता है। आगे चलकर रामायण-महाभारत आदि पर आधारित अनेक कहानियाँ द्विवेदी युग में लिखी गईं। किन्तु हिन्दी बाल कहानी अपने स्वर्णिम अभ्युदय के लिए प्रेमचन्द्र जी की ऋणी है। उनकी अनेक कहानियों में बाल-मन का प्रथम निवेश हुआ और उसकी ज्वलंत झाँकी अनेक कहानियों में मिलती है। बालमन के अनुरूप उनकी बहुत सी कहानियाँ जो कि बड़ों के लिए ही थीं, बच्चों ने उल्लास के साथ हृदयंगम की।" (हिन्दी की श्रेष्ठ बाल कहानियाँ, उषा यादव एवं राजकिशोर सिंह, आत्माराम एण्ड सन्स, 2001 ) | विडम्बना ही हॆ कि कविताओं या कविता-पुस्तकों के अनुवाद अपवाद स्वरूप ही देखने को मिलते हॆं । रमेश कॊशिक ने रूसी बाल कविताओं के अच्छे अनुवाद किए हॆं । दिविक रमेश द्वारा चयनित ऒर अनूदित ऒर नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित कोरियाई कविताओं की पुस्तक ’कोरियाई बाल कविताएं’(2001) बच्चों में बहुत ही लोकप्रिय सिद्ध हुई हॆ । महेश नेवाणी ने सिंधी के साथ हिन्दी में बाल कविताओं के हिन्दी अनुवाद पुस्तक रूप में प्रकाशित किए हॆं ।पुस्तक का नाम -बधी एकता हॆ जो पहली बार 2005 में प्रकाशित हुई थी । लोकिन पुस्तक खास स्कूली बच्चों के लिए हॆ । ’दो शब्द’ में महेश नेवाणी की चिन्ता विचारणीय हॆ -"सिंधी जाति के लोगों पर से मेरा विश्वास डोल गया हॆ। सिंधी भाषा में कविता करूं या नहीं इस पर फिर एक बार गॊर करना पड़ेगा ।" एक बात यहां अवश्य कहना चाहूंगा कि अनुवाद करने से पहले रचानाओं का चयन बहुत सावधानी के साथ किया जाना चाहिए । तब अनु्वाद बहुत प्रभाव छोड़ता हॆ ।कठिनाई यह भी हॆ कि अनुवाद को भी दोयम दर्जे का मानने वालों की कमी नहीं हॆ । डॉ. श्याम सिंह शशि कि यह चिन्ता जायज ही हॆ कि "विदेशी भाषाओं के बालसाहित्य-लेखकों में चार्ल्स डिकिंस, मोपांसा, टॉलस्टाय, अरकदे, श़ैदार का कुछ बालसाहित्य हिंदी में अनूदित हुआ है किंतु तमिल, तेलुगु, कन्नड, मलयालम आदि भारतीय भाषाओं के कई बाल उपन्यास का अनुवाद शायद ही हिंदी में हुआ हो। कैसी विडंबना है ? वास्तव में अनुवाद को भी दोयम दर्जे का लेखन माना जाता रहा है, जिसकी चर्चा हिंदी साहित्य के इतिहासों में प्रायः नगण्य है। बांग्ला से हिंदी में कथा साहित्य का जितना अनुवाद हुआ है - उसकी अपेक्षा एक-तिहाई भी शायद हिंदी से बांग्ला में नहीं हुआ।" फिर भी ऎसा तो कहा ही जा सकता कि 21वीं सदी के एक दशक में अनुवाद के क्षेत्र में भले ही आशा के अनुरूप या पहले की तुलना में संख्या की दृष्टि से थोड़ी कमी नज़र आती हो लेकिन गुणवत्ता की दष्टि से कोई कमी नहीं हॆ । साहित्य अकादमी को ही लें । साहित्य अकादेमी के प्रकाशन कार्यक्रम की नई योजनाओं में से एक योजना है-विभिन्न भाषाओं में बाल पुस्तकों का प्रकाशन। भारतीय भाषाओं में बाल कृतियों के अनुवादों के प्रकाशन से इस योजना का शुभारंभ किया गया। आकर्षक चित्रों के साथ ये कृतियाँ अकादेमी द्वारा सन् 1990 से प्रकाशित की जा रही हैं। 16 भारतीय भाषाओं की बाल कृतियों के 100 से अधिक अनुवाद तथा साथ ही गारो, बोडो, हमान खासी, काकबरोक और राभा भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित किए जा चुके हैं।



अनुवाद बहुत बार ऎतिहासिक भूमिका निभा दिया करता हॆ । यह बात कोरिया के बच्चों के पितामह माने जाने वाले सो पा बांग जुंग हवा के हवाले से अच्छी तरह से समझी जा सकती हॆ । सो पा स्वयं बहुत अच्छे बाल-साहित्यकार थे ऒर सथ ही 1923 में उन्होंने बच्चों के लिए पत्रिका भी निकाली ।1923 से 5 मई को बाल-दिवस के रूप में स्थापित भी किया ताकि बच्चों में स्वतंत्रता ऒर राष्ट्र का गॊरव घर कर सके । उस समय कोरिया जापान के अधीन था । उन्होंने ऒर एक अन्य बहुत बड़े कोरियाई बाल-साहित्यकार (कवि) यून सॉक जुंग ने नोबेल पुरस्कार विजेता रवीन्द्रनाथ टॆगॊर की बच्चे ऒर बचपन पर केन्द्रित बाल-कविताओं की पस्तक ’द क्रीसेंट मून’ का अनुवाद किया था । टॆगॊर की पुस्तक 1913 में प्रकाशित हुई थी ऒर स्वयं टॆगॊर ने अपनी रचनाओं का अंग्रेजी में अनुवाद किया था । खॆर । यह वह समय था जब कोरिया में पारम्परिक रूप से बच्चों के साहित्य के प्रति कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता था । इस पुस्तक का अनुवाद न केवल उत्तम कोटि की बाल-कविता का परिचायक माना गया बल्कि कोरियाई बाल-साहित्य के क्षेत्र में नयी शॆली की स्थापना के अवसर के रूप में भी स्वीकार किया गया । स्पष्ट हॆ कि बाल-साहित्य के क्षेत्र में भी,किसी भी दृष्टि से, अनुवाद की भूमिका कम नहीं होती ।

यदि बालक सृष्टि की सबसे मूल्यवान रचना हॆ तो बाल-साहित्य का महत्व भी कम नहीं हॆ । ऒर भारत के संदर्भ में भारतीय ऒर विश्व के संदर्भ में वॆश्विक बालक ऒर बालक की कल्पना बिना अनुवाद के करना आज लगभग असंभव हॆ । इसीलिए भारत में बच्चों की एक अलग केन्द्रीय अकादमी आज की बड़ी जरूरत हॆ जिसकी एक महत्तवपूर्ण गतिविधि अनुवाद कर्म होना चाहिए । विस्तार से फिर कभी । आज हिन्दी में बहुत अच्छा लिखा जाने के बावजूद ऒर अच्छा लिखे जाने ऒर उसके समय पर प्रकाशन की प्रेरणादयी स्थितियां बनाए बिना न बालक का ऒर न ही मानव का ही हित होने वाला हॆ । जो संस्थाएं अपने सीमित साधनों के द्वारा इस दिशा में कुछ काम कर रही हॆं उन्हॆं बढ़ावा मिलना चाहिए । फिर उतना ही ध्यान अनुवाद पर देना होगा ।यूं हिन्दी में बाल साहित्य की बिक्री, यदि प्रकाशकों की माने तो उत्साहवर्द्धक हॆ -"वाणी प्रकाशन के प्रेमकिरण जी ने बताया कि उपन्यास, कहानी संग्रह के अलावा बाल साहित्य से जुड़ी पुस्तकों की अच्छी बिक्री है। साहित्य अकादमी के स्टाल पर विभिन्न भाषाओं की अनूदित बाल साहित्य व लोक कथाएं संबंधी पुस्तकों की काफी बिक्री है। राजकमल प्रकाशन के दिनेश आधार पाण्डेय ने बताया कि अल्बर्ट आइंस्टाइन की जीवनी, रवीन्द्रनाथ टैगोर की गीतांजलि, गुणाकर मुले की अक्षर कथा व तारों भरा आकाश समेत अन्य प्रसिद्ध कहानियों की किताबों की अच्छी बिक्री है।"(पटना, पुस्तक मेला ) । हॆरी पोटर(जे.के. राउलिंग) को ही लें ।भारत तथा विश्व की चौंसठ भाषाओं में उसके अनुवाद छप चुके हैं। करोड़ों बाल पाठकों ने उन्हें पढ़ा है।वस्तुत: भारतीय बालसाहित्य ऒर हिन्दी में बाल साहित्य का भविष्य उज्ज्वल हॆ । हां उसे हॆरी पॉटर की तरह प्रमोट करना भी आना चाहिए । यहीं पर थोड़ा विषयांतर करते हुए मॆं इस संतुलित दृष्टि का भी समर्थन करना चाहूंगा -"हम बालसाहित्य के लेखकों से कहना चाहेंगे कि वे इक्कीसवीं सदी के बालक को ध्यान में रखते हुए उत्तर कंप्यूटरी युग तक की कल्पना करेंगे तो भारतीय बालसाहित्य विश्व स्तर पर समसामयिक रूप ले सकेगा। हाँ, उसे रामायण, महाभारत तथा भारत के स्वर्णिम इतिहास का ज्ञान कराना भी आवश्यक है। हिंदी बालसाहित्य के लेखकों में प्रायः बहस होती रही है कि उन्हें परी कथाएँ लिखनी चाहिए या विज्ञान कथाएँ ? हमारा मानना है कि बचपन को कल्पना लोक में विचरने के लिए परी कथाएँ भी चाहिए किंतु भूत-प्रेत या अंधविश्वास का मनोरंजन बाल मन से खिलवाड़ होगा।"

खॆर चलते चलते मॆं इस सदी की हिन्दी में अनूदित कुछ पुस्तकों की ऒर ध्यान दिलाना चाहूंगा, वे हॆं -सुकुमार राय की चुनिन्दा कहानियां (अनुवादक : अमर गोस्वामी, साहित्य अकादमी ,2002), जापान की कथाएं (साहित्य अकादमी, 2001 ), जादुई बांसुरी ऒर अन्य कोरियाई कथाएं ( अनुवादक: दिविक रमेश नेशनल बुक ट्रस्ट, 2009), कोरियाई लोक कथाएं (अनुवादक: दिविक रमेश पीताम्बर पब्लिशिंग कम्पनी, 2000) । एक प्रकाशन हॆ -तूलिका । इसने इसी सदी में द्विभाषी अर्थात अंग्रजी ऒर हिन्दी में अनेक पुस्तकें प्रकाशित की हॆं । असल में यह पुस्तक-श्रृंखला हॆ । प्रकाशक के अनुसार इन पुस्तकों से बच्चों की शब्द-कल्पना-शक्ति बढ़ेगी- द्विभाषी पुस्तकों की यह श्रृंखला, कहानी सुनाने के माहौल में तस्वीरों की मदद से बच्चों की शब्द अनुमान शक्ति और शब्द भंडार बढ़ाने में मदद करती है। । कहा गया हॆ-"This series of bilingual books encourages children to ‘imagine words’ and build vocabulary with the aid of pictures in a storytelling setting. By providing words in two languages simultaneously, the books create a platform for children to build their own narratives. This helps them use words creatively, and remember them." एक खबर के अनुसार -" बच्चों के लिए काम करनेवाली गैरसरकारी और गैरव्यावसायिक संस्था ‘कथा’ ने बच्चों के लिए हिंदी भाषा में तीन पुस्तकें तैयार की हैं। तीनों पुस्तकें अन्य भाषाओं से हिंदी में अनूदित हैं। अनुवाद में हिंदी की आत्मा कितनी उतर पाई है या फिर कथाओं के तार स्थानीयता और बाल सुलभ भावनाओं के साथ कितना जुड़ पाते हैं? शायद ये अलग मुद्दे होकर भी वैश्विक युग में ज्यादा मायने नहीं रखते, लेकिन बच्चे पुस्तक को देखने के बाद उसे हाथ में लेते हैं, उसके पृष्ठों पलटते हैं और पुस्तकों के चित्रों में रम जाते हैं। इन पुस्तकों की यही ताकत है और बच्चों की पुस्तकों में यह ताकत होनी भी चाहिए। बच्चे चित्रों के जरिए शब्दों की पहचान कर लेते हैं और पृष्ठों को पलटते जाते हैं। पुस्तकों के निर्माण में संसाधनों की सुलभता का स्पष्ट दर्शन होता है, साथ ही उस सुरुचि का भी, जिसके बगैर इस दर्जे का काम कर पाना असंभव है। लेकिन इसके साथ ही पुस्तकों की कीमतें भी अधिक हैं। ‘सूई की नोक पर था एक’ गीता धर्मराजन द्वारा रचित अंग्रेजी भाषा की पुस्तक ‘ऑन द टिप ऑफ ए पिन वाज’ को विवेक नित्यानंद और मोयना मजुमदार ने हिंदी में रूपांतरित किया है। इसी तरह बियाट्रिस आलेमान्या द्वारा फ्रेंच भाषा में लिखी पुस्तक ‘ए लॉयन इन पेरिस’ को हिंदी में अनुदित किया है मोयना मजुमदार ने। इस पुस्तक की कथा पेरिस के प्रसिद्ध दोंफेर-रोशेरो चौराहे पर स्थापित शेर से प्रेरित है। यह पुस्तक अनोखी है। कथा की तीसरी पुस्तक है ‘उल्टा पुल्टा’। जर्मन भाषा की लेखिका ऑत्ये दाम्म की बच्चों के लिए लिखी गई पुस्तक 'फ्लिडोलिन’ का हिंदी अनुवाद है। अनुवाद मोयना मजुमदार ने किया है। यह कहानी चमगादड़ों के माध्यम से बच्चों में कुतूहल और सूझ-बूझ पैदा करती है। बहरहाल, इस सुरुचिपूर्ण कार्य के लिए ‘कथा’ और उसके साथ जुड़े लोग साधुवाद के पात्र हैं।" किताबघर प्रकाशन, वाणी प्रकाशन, आलेख प्रकाशन ऒर आत्माराम एण्ड संस जॆसी अनेक महत्तवपूर्ण संस्थाएं हॆं जिनका बाल साहित्य में भी अच्छा खासा हस्तक्षेप हॆ । आशा की जा सकती हॆ कि ये अनुवाद के क्षेत्र में भी, खासकर बाल कविता के अनुवाद के क्षेत्र में अधिक से अधिक कृतियां लाएंगी । अंत में किताब्घर द्वारा प्रकाशित "बाल मनोवॆज्ञानिक लघुकाथाएं"(सं० रामेश्वर काम्बोज ’हिमांशु ) से एक पंजाबी लघुकथा का आनन्द लीजिए जिसका हिन्दी में शीर्षक हॆ -बदला ऒर इसके लेखक-अनुवादक डॉ श्यामसुंदर दीप्ति हॆं :

’देख ! तू हर बात पर जिद मत किया कर। जो काम करने का होता है, वह तू करती नहीं।’ उमा ने रचना को झिड़कते हुए कहा।’ ’करती तो हूँ सारा काम। सब्जी बनाने के लिए टमाटर नहीं ला के दिए थे ! आपके साथ कपड़े भी तो धुलवाये थे।’ रचना ने मम्मी को दलील दी।”यही काम तो नहीं करने होते। पढ़ भी लिया कर।’ उमा को और गुस्सा आ गया।’
’कर तो लिया स्कूल का काम।’ रचना ने अपना स्पष्टीकरण दिया।
’अच्छा ! ज्यादा बातें मत कर और एक तरफ़ होकर बैठ।’ रचना सिलाई-मशीन के कपड़े को पकड़ने लगी। उमा को गुस्सा आ गया और उसने थप्पड़ जमा दिया।
’अब अगर जो हाथ आ जाता मशीन में !’
रचना रोने लगी।
’अब रोना आ गया, चुप कर, नहीं तो और लगेगी एक। अच्छी बातें नहीं सीखनी, कोई कहना नहीं मानना।’
थोड़ी देर में दरवाजा खटका। उमा ने रचना से कहा, ’अच्छा ! जाकर देख, कौन है बाहर?’
पहले तो वह बैठी रही और गुस्से से मम्मी की तरफ़ देखती रही, पर फिर दुबारा कहने पर उठी और दरवाजा खोला। रचना के पापा का कोई दोस्त था।
रचना दरवाजा खोलकर लौट आई।
“कौन था ?’ रमा ने पूछा।
’अंकल थे।’ रचना ने रूखा-सा जवाब दिया और साथ ही बोली, ’मैंने अंकल को नमस्ते भी नहीं की।’

ऒर कोरियाई बाल कविताएं के सुविख्यात कवि यून सॉक जूंग की एक बाल कविता भी :
दुनिया का मानचित्र
घर का काम मिला हॆ मुझको
नक्शे में दुनिया दिखलाऊं
रात बॆठ कर मेहनत की पर
रहा अधूरा क्या बतलाऊं

देश न हो जो तेरा मेरा
राष्ट्र न हो जो मेरा तेरा
हो बस दुनिया देश बड़ा सा
तब होगा आसान बनाना
नक्शे में दुनिया बतलाना
(प्यारी सी दुनिया दिखलाना ) ।

बी-295, सेक्टर-20,
नोएडा-201301

मो० 09910177099
divik_ramesh@yahoo.com

सोमवार, 19 जुलाई 2010

प्यारे दोस्त रमेश के लिए

दिविक रमेश या फ़िर रमेश शर्मा
कोई फ़र्क नहीं पड़ता हॆ
जिस भी नाम से मॆंने पुकारा
एक दोस्त को ही सदा करीब पाया ।

आपने नहीं देखा इस शख्स को
बहुत करीब से
जाना भी नहीं इस पहचाने चेहेरे को
पर देखा ऒर महसूसा तो होगा
क्षितिज की गोद में बॆठे मासूम
शीतल अरुणिमा बिखेरते
तपती दोपहरी में आग बने
पर्वतों के शिखरों को लांघते
ऒर फिर क्षितिज पर पश्चिम के
मंद-मंद सुरमई अंधेरे के बीच
थकान को विश्रान्ति का गीत सुनाते
सूर्य को ।
आपने, नहीं देखा इस शख्स को ।

प्रेम जनमेजय
सोमवार २८ अगस्त, २००६
( यह कविता प्रेम ने मेरे साठवें जन्म दिन पर भेंट की थी । मेरी वास्तविक जन्मतिथि २८ अगस्त हॆ जबकि प्रमाण-पत्रों में ६ फरवरी लिखाई गई हॆ । मित्र की इस मीठी सॊगात को आपसे बांटते हुए मुझे हर्ष हॆ ।)

रविवार, 11 जुलाई 2010

प्रणाम सम्पूर्ण

न सही अदृश्य या निराकार ही
तब भी करूंगा समर्पित
समस्त को
निज प्रणाम यहीं से ।

भले ही कह लें मुझे नास्तिक
पर करना हॆ मुझे अनुकरण वृक्ष का
होकर फलीभूत यहीं से
करना हॆ समर्पित
सबकुछ ।

जब भिगो सकते हॆं मेघ
वहीं से
जब महका सकते हॆं फूल
वहीं से
तो क्यों नहीं मॆं
यहीं से ।

चाहता हूं फले फूले लोक गीत
लोक में रहकर, यहीं पर ।
फले फूले जंगल, जंगल में
यहीं पर ।

चाहता हूं
मिलता रहे आशीर्वाद यहीं पर
समस्त का
जो न अदृश्य हॆ न निराकार ही ।

ऒर करता रहूं समर्पित
निज प्रणाम यहीं से
एक ऎसा प्रणाम
जो न डर हॆ न दीनता
न धर्म हॆ न हीनता ।

सोमवार, 12 अप्रैल 2010

बस

दिविक रमेश
नहीं जानता
फ़र्क होता भी हॆ किसी विचार ऒर रणनीति में ।
कवि हूं न
मेरे लिए तो विचार
जीना भी हॆ ऒर मरना भी ।
भावान्ध कहे या कहे कोई मूर्ख ही ।

नहीं समझ पाता
जब भून दिया जाता हॆ
नोंच लिया जाता हॆ तमाम रिश्तों से
उन तमाम जनों को
जो न स्व भाव से न स्व विचार से ही
किसी के विरुद्ध होते हॆं --
विरुद्ध तो वे माऎं होंगी
होंगी वे पत्नियां
वे भाई ऒर बहनें
वे बेटे ऒर बेटियां ।
अपने विरुद्ध इन तमाम जनों को भी
क्या भून डाला जाएगा
अपने किसी भाव या विचार के लिए ।

एक कवि हुए थे साथी, शायद दो भी या ऒर भी
जिन्होंने ख़त लिखा था वेतनभोगी पुलसियों के नाम
किया था क्षोभ भी व्यक्त
की थी टिप्पणी भी उनकी भूमिका पर
लेकिन अधिक से अधिक समझ के लिए
ऒर इस भूनने से कहीं ज़्यादा मानवीय
कहीं ज़्यादा आत्मीय
ऒर कहीं ज़्यादा आसरदार भी !

फल देखे हॆं मॆंने वृक्षों पर पकते हुए
मॆंने की हॆ महसूस गन्ध
ताज़ा ताज़ा चोए कच्चे दूध की ।
उतारी हॆ जी में
जंगल से आती हवाओं की
नदी के जल से होती ठिठोलियां, अठखेलियां ।

बस!
ऒर बस !
बस बस !
"आभिव्यक्ति के ख़तरे" की
अब ऒर अधिक मॊकापरस्त व्याख्या
बस !

हथियार सोचता भी आदमी हॆ
बनाता भी
सच तो यह हॆ
कि चलाता भी आदमी ही हॆ ।

अगर भूनना हॆ
तो भूनना चाहिए
वह सोचना
वह बनाना
वह चलाना ।

आदमी को किया जाना चाहिए निहत्था ।
बतानी चाहिए
दो आमने सामने खड़े आदमियों की
निहत्थी ताकत
बना देना चाहिए
जंगलों को एक राह
बस!
ऒर बस!

मंगलवार, 23 मार्च 2010

सड़क से संसद तक

वह गिर गया था
सम्भल कर !
ऒर गिरा भी रहा
हथेलियां मल कर !

वह मुस्कुराया था आंखे भींच कर !
वह कराहा था
ढूंढ़ते हुए अपनी चोट को, दर्द को
जाने कहां थी, कहां था
जो ।

भीड़ में
अपवाद की तरह मॊजूद राजगुरू चीखा
हटो! हटो!
आने दो हवा!
कॆसे गिरा !
ज़रूर गिराया होगा किसी ने-
उफ आयी हॆं कितनी चोटें ।

बोली भीड़ -- कहां? कहां?

खिंच गए राजगुरू तनते हुए
कोई चुनाओ तो था नहीं
कि विनम्र होते । बोले --
देखते नहीं दर्द
कराह भले मानस की!
चुप !
कहां, कहां!
उठाओ
ज़रा हाथ लगाओ
ऒर इन्हें सड़क से मेरी गाड़ी में लिटाओ!
मुझे इलाज कराना हॆ इनका
ऒर फिर संसद जाना हॆ ।

कहां? कहां?
मुंह बनाया रजगुरू ने
धर्मगुरू की मुद्रा में
ऒर कहा--
आओ! उठाओ!

उसी आदमी के पक्ष में
हाथ जोड़े
कर रहा था विनती राजगुरू
अगले चुनाओ में --
इन्हें जिताओ
जिताओ !
सड़क के आदमी को संसद पहुंचाओ !

लोग भूल चुके थे ।

मंगलवार, 29 दिसंबर 2009

हाय-तॊबा क्यों ऒर क्यों नहीं

आज सहित्य में इतनी धड़ेबाजी हो चुकी हॆ कि क्या गलत हॆ ऒर क्या ठीक इसका सही सही निर्णय कर पाना कठिन हो गया हॆ । सही लोगों को पुरस्कार मिलता हॆ तब भी जोड़-तोड़ की शंका तो बनी ही रह्ती हॆ । कॆलाश वाजपेयी ऎसा कवि तो नहीं ही हॆ जो इस पुरस्कार के योग्य नहीं हॆ । बल्कि विलम्ब ही हुआ हॆ । पुरस्कारों की राजनीति इतनी गिर चुकी हॆ कि ज्यादातर लेखकों को असमय पुरस्कार मिले हॆ जबकि बहुतों को या तो बहुत देर से मिले हॆं या फिर मिले ही नहीं हॆं ।मॆंने कभी लिखा था कि साहित्य अकादमी को हिन्दी साहित्य के लिए हर वर्ष के लिए कम से कम चार पुरस्कार निर्धारित करने होंगे । तब जाकर कुछ न्याय होगा । यहां तो कल का छोकरा या छोकरी , अधिकतर साहित्येतर कारणों से पुरस्कार प्राप्त कर लेने में सफल होते हॆं जबकि साहित्येतर कारणों से ही कितने ही समकक्ष ऒर वरिष्ठ तक उपेक्षित कर दिए जाते हॆं । मुझे याद आ रहा हॆ कि जब केदार जी को यह पुरस्कार मिला था तो उन्होंने कहा था कि पुरस्कार गिरिजाकुमार माथुर को मिलना चाहिये था । अगली बार मथुर जी को ही मिला था । ऎसा तंत्र फॆला दिया गया हॆ- पत्रिकाओं से पुस्तकों तक, संस्थाओं से विश्वविद्यालयों तक - कि जब भी दिमाग में उभरें तो वही प्रचारित-प्रसारित गिने-चुने नाम ही उभरें । शेष उपेक्षित रहे रहें । संयोग से यदि ऎसे उपेक्षितों में से किसी का नाम प्रस्तावित भी कर दे तो उस ऒर उसकी समझ पर टूट पड़ों ताकि वह भी उनके ही सुर में अलापने को बाध्य हो जाए । लेकिन कुछ अपवाद भी होते हॆं । वे बेशर्म होकर डटे रहते हॆं ऒर सहते हॆं । आप सर्वे कराएं, भाइयों के पास आगामी कितने ही वर्षों के लिए पुरस्कार प्राप्त करने वालों की सूची मिल जाएगी । संयोग से सूची का नाम सफल नहीं होता तो वे ही सिर पर आसमान उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगे । कॆलाश वाजपेयी को बधाई ।
अच्छा एक प्रश्न चलते चलते -मनोरंजन के लिए -कितने लोग होंगे जिन्हें दिविक रमेश का नाम भी मालूम होगा ? बाकी सब तो छोड़िये ।
नव वर्ष की शुभकामनाऒं के साथ,
आप ही का
दिविक रमॆश

सोमवार, 7 दिसंबर 2009

कविता

मॆं ढूंढ्ता जिसे था ...
दिविक रमेश

आपकी तारीफ़ ?
मंत्री ।

ऒर आप ?
अफसर ।

आप ?
लोगों का नुमाइंदा-
सदस्य संसद का ।

ऒर आप सब ?
अगर हमसे काम हॆ तो सरकारी
नहीं तो बसों में लदी लीद ।

आप तो सज्जन नज़र आतो हॆं !

जी नहीं
ये सम्पादक हॆं
ऒर मॆं अध्यापक ।

लेकिन तुम ?
अबे बताना इसे
साले को इतना भी नहीं पता कि हम कॊन हॆं ।

अच्छा भाई अच्छा ।
अच्छा आप कॊन हॆं
कितनी तो शराफत हॆ आपके चेहरे पर !

मॆं दुकानदार हूं
दास आपका
कहें तो कृपया लूट लूं ।

नहीं भाई नहीं, माफ़ करना, गलती हुई ।

भले आदमी तुम तो वही हो न
जिसकी तलाश हॆ मुझे ?

अपना रास्ता नाप
देने को खोटा सिक्का नहीं
साला आदमी बोलता हॆ ह्ट्टे कट्टे भिखारी को ।

मान्यवर
आप जरूर वही हॆं
कितनी मिठास हॆ आपकी जुबान में !

शिष्य! शिकार अच्छा हॆ
इन्हें हमारा परिचय दो ।
यदि न ग्रहण करे शिष्यत्व
तो निकाल कर हमारी बगल से छुरी
इनके पेट में भोंक दो ।

उफ़ भागते भागते दम फूल गया हॆ
तुम्हें कहां ढूंढूं आदमी !