सोमवार, 7 दिसंबर 2009

आखिरी फूल
दिविक रमेश

कुछ बेहिसाब फूलों के लिए
उसने हाथ फॆलाया
उसके हाथ की रेखाएं
ढ़ेरों ढ़ेर फूलों में तब्दील हो गयीं

इतने फूलों को वह कॆसे बंद करता
कॆसे सड़ने देता मुट्ठी में

उसने उन्हें आकाश में उछाल दिया
चंद ग्वार बच्चे इसी ताक में थे
हंसते हंसते
बीनने लगे फूल धरती से ।

सिर्फ एक बच्चा था
बाहों को कमर पर बांधे
जो घूर रहा था ।
उसकी पोरों में बंद आखिरी फूल को
इत्मीनान से देख रहा था ।

बोला-
’यह फुल मुझे दो न ?’

वह चुप ।

’यह फूल मुझे दो न ?’
बच्चा फिर बोला ।

’क्यों, तुमने धरती से क्यों नहीं बीना ?’
उसने पूछा ।

’दो मुझे फूल’
इस बार
बदल दिया था उसने
स्थान क्रियापद का ।
एक दलित भाव
उसके चेहरे से ख़ारिज हो चुका था।

ख़ुद फूल भी हो उट्टा था उत्सुक
उसके हाथों में आने को ।

क्रमश: ।

रविवार, 6 दिसंबर 2009

कविता

समारोह अभी शुरू नहीं हुआ था

दिविक रमॆश

कल अखबार से जाना था
एक मित्र ने
दूसरे को पछाड़ दिया ।

मेंने केदार जी से पूछा
क्या अर्थ हुआ ?

जवाब मंगलेश ने दिया-
आलोचक ने अब राजेश को काट दिया
उदय जी का नाम
वन पर आ गया हॆ ।

ऒर कमल ?
पूछा मॆंने ।

मिलते हॆं
आप चाय लेंगे -
जवाब मिला ।

सवाल मॆंने आलोचक से भी पूछा ।
आलोचक मुस्कराया
ऒर केदार जी की ऒर इशारा कर
चला गया ।

समारोह अभी शुरू नहीं हुआ था ।

नामवर जी
रघूवीर सहाय को उलांघते हुए
त्रिलोचन की ऒर जा रहे थे
केदार जी जहां
पहले ही से बतिया रहे थे
ऒर वहां न के बराबर खड़े दिविक रमेश
ढूंह में बेकार
खुद को खोजने में लगे थे ।

नहीं रहा गया
पुरानी पत्रिका के नये सम्पादक से
कहा-
देखना श्री सहाय अब
हिन्दी के सबसे उपेक्षित कवि को
उसके नाम से पुकारेंगे ।

पता चला कि समारोह शुरू हो गया था ।

सभागार शायद साहित्य अकादमी का था ।

गुरुवार, 20 अगस्त 2009

गेहूं घर आया हॆ - २७ अगस्त को ५.३० बजे

मान्यवर बन्धुओ ! गेहूं घर आया हॆ (किताबघर प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली से प्रकाशित) कविता संग्रह पर २७ अगस्त, २००९ को सायं ५.३० बजे आई.सी.सी.आर , आज़ाद भवन, आई.टी.ओ, नई दिल्ली में एक चर्चा गोष्ठी आयोजित की गई हॆ । आप सब सादर आमंत्रित हॆं । संयोजक प्रेम जनमेजय हॆं । शेष सूचना बाद में ।

शनिवार, 15 अगस्त 2009

ज़रूर फलित होगा मॊसम

बंद
हवा हॆ या
साधक हो गई हॆं वनस्पतियां
या होकर दार्शनिक
डूब गए हॆं वृक्ष
गहरे चिन्तन में ऒर शेष हॆ स्थिर प्रतीक्षा में ।

तापमान तो कहीं कम हॆ
आषाढ़ का ।

ज़रूर फलित होगा मॊसम-
एक हॆ
शास्त्र ऒर विज्ञान
लोक के अनुमान में ।

एक बारिश
ऒर विलय
भेदों-उपभेदों का ।

होगी न बारिश
आंखों पर
ऒट दे हथेली की
पूछता हॆ आकाश से
मन ही मन चिन्ता मॆं
राम सिंह ।

ऒर देख लेता हॆ
भरी पूरी आस से
हल को ।

'बारिश होगी न
क्यों नहीं
ज़रूर होग बारिश' -

एक आम स्वर उभरता हॆ
भारत भूमि का ।

पर उधर
एक चिन्तित हॆ
नहीं हुई बारिश
तो खिसक लेगी गद्दी
मंत्री पद की ।
ऒर खुश हॆं विरोधी - मिलेगा एक ऒर मुद्दा

एक ऒर चिन्तित हॆ
नहीं हुई बारिश
तो हो जाएगा
अपूर्व घाटा
बवजूद तमाम लूट ख्सोट के

पार गूंजता रहा हॆ आम स्वर
उभरता
यज्ञ के
सुगन्धित धुंए ऒर
मंत्रों की प्रशस्तियों को चीरता
भारत भमि का-
'बारिश होगी न
क्यों नहीं
ज़रूर होगी बारिश ।'

एक पत्थर
जाने कहांसे आता हॆ
ताज्जुब हॆ
वह बोलता भी हॆ-
'हां बारिश होगी
गनीमत हॆ
प्रकृति को हमारी
नहीं लगी बीमारी
चुनावों की

होगी
क्यों नहीं होगी
ज़रूर होगी बारिश ।'

हंस पड़ता हॆ अनायास
मोलवी को देखते हुए पंडित
कहते कहते
ज़रूर होगी बारिश ।

उधर
माथे पर रखे हाथ
चिन्तित
बॆठा हॆ वॆज्ञानिक-
'जाने कहां गलती हुई अनुमान में
होगी तो ज़रूर बारीश ।

सुखान्त नाटक की तरह
या
व्रत-उपवासों की
सुखान्त कथाओं की तरह
आखिर हो जाती हॆ बारिश ।

हालांकि
बहुत से नहीं भी जानते
कहां कहां
पर
अगर भरा पड़ा हॆ मीडिया- हमारा प्रचार तंत्र
तो बारिश तो ज़रूर हुई हॆ । -

सोचना बस इतना हॆ
कि हवा अब भी क्यों बंद हॆ
क्यों साधक सी हो गई हॆं वनस्पतियां
क्यों डूबे हॆं वृक्ष होकर दार्शनिक
गहरे चिन्तन में
ऒर शेष
क्यों स्थिर हॆ अब भी
प्रतीक्षा में ।

इन्द्र ! हे नृप !
तुम हो भी कि नहीं ?

होगी
होगी क्यों नहीं
बारिश तो ज़रूर होगी ।

सोमवार, 3 अगस्त 2009

सब मंगलमय हॆ

एक रिश्ता
जो पीपल काटने
ऒर मट्रो का खंबे बनाने के बीच
बना दिया हॆ खम्भे ने ढ़हकर
पीकर रक्त मजरों, अबोधों का
चर्चा में हॆ
मंगल ग्रह पर ।

चर्चा में हॆ
ऒर किसी को नहीं मालूम
मुखिया श्रीधरन जी को भी नहीं ।
मालूम हॆ तो बस मालूम हॆ निर्माता कम्पनी के
उचित ठेकेदार को
जिसकी निगाह में न केवल अपना
कितनों का ही बसा हॆ मंगल ।
यहां तक कि
जांच कर्ताओं का भी ।

गनीमत हॆ
चर्चा महज मंगल ग्रह पर हॆ
ऒर वह किसी को भी नहीं मालूम ।
पेट हिलाने वाले
बाबा रामदेव को भी नहीं ।

सब मंगलमय हॆ-
सर्वे भवन्तु सुखिन: .....

ओ३म!
हे ईश्वर !
वंचित न करना हमें
विस्मृति सुख से !

ओ३म!
सब मंगलमय हो ।

शुक्रवार, 24 जुलाई 2009

सोचेगी कभी भाषा

जिसे रॊंदा हॆ जब चाहा तब
जिसका किया हॆ दुरुपयोग, सबसे ज़्यादा ।
जब चाहा तब
निकाल फ़ेंका जिसे बाहर ।
कितना तो जुतियाया हॆ जिसे
प्रकोप में, प्रलोभ में
वह तुम्ही हो न भाषा ।

तुम्हीं हो न
सहकर बलात्कार से भी ज़्यादा
रह जाती हो मूक
सोचो भाषा -
रह जाती हो मूक
जबकी सम्पदा हॆ
शब्दॊं की, अर्थों की -
रह जाती हो मूक ।

ऒर देखो तो
ढूंढ लेते हॆं दोष तुम्ही में सब
तुम्हें ही
लतियाते हॆं कितना -
कि कितनी गन्दी हॆ भाषा
कितनी भ्रष्ट ऒर अश्लील हॆ
अमर्यादित ऒर टुच्ची
यानी ये सब विशेषण
डाल दिए जाते हॆं तुम्हारे ही गले ।

कहिए अडवानी जी ! ऒर आप भी मोदी जी!
क्या मॆंने झूठ कहा ?

कभी तो आता होगा मन में, न सही जुबान पर
कि गन्दी वह नहीं, नहीं वह भ्रष्ट ऒर अश्लील ही ।
क्या कहेंगे उसे
जो उसे ढालता हॆ,
पालता हॆ
ऒर करा करा कर दुष्कर्म
अपनी रोज़ी चलाता हॆ ।
ऒर सर से पांव तक करते हुए नंगा
ख़ुद नंगा हो जाता हॆ
ऒर फिर तुझे ही ओढ़ता हॆ भाषा ।

कभी तो सोचती होगी न भाषा !

कोई आयोग भी तो नही
जहां दे सके दस्तक ।

कभी तो सोचती होगी न भाषा !

कॊन नहीं जानता यूं, मान्यवर प्रधानमंत्री जी !
कॊन दम रखा हॆ इस ससुरी भाषा में
होती हॆ महज पानी
फिसल कर रह जाती हॆ
चिकने घड़ों पर
बेमानी ।

पर होती बहुत ज़रूरी हॆ, अगर मानो ।
न मिले
तो सूख जाए कंठ ऒर जुबान भी ।

माने जाते हॆं आप बड़े
सो माने न माने
पर इतना ज़रूर मान लीजिए
कि सोचती ही होगी भाषा भी
कभी न कभी ।


मां गांव में हॆ

चाहता था
आ बसे मां भी
यहां, इस शहर में ।

पर मां चाहती थी
आए गांव भी थोड़ा साथ में
जो न शहर को मंजूर था न मुझे ही ।

न सका गांव
न आ सकी मां ही
शहर में ।

ऒर गांव
मॆं क्या करता जाकर ।

पर देखता हूं
कुछ गांव तो आज भी ज़रूर हॆ
देह के किसी भीतरी भाग में
इधर उधर छिटका, थोड़ा थोड़ा चिपका ।

मां आती
बिना किए घोषणा
तो थोड़ा बहुत ही सही
गांव तो आता ही न
शहर में ।

पर कॆसे आता वह खुला खुला दालान, आंगन
जहां बॆठ चारपाई पर
मां बतियाती हॆ
भीत के उस ओर खड़ी चाची से, बहुओं से ।
करवाती हॆ मालिश
पड़ोस की रामवती से ।
सुस्ता लेती हॆ जहां
धूप का सबसे खूबसूरत रूप ओढ़ कर
किसी लोक गीत की ओट में ।

आने को तो
कहां आ पाती हॆं वे चर्चाएं भी
जिनमें आज भी मॊजूद हॆं खेत, पॆर, कुंए ऒर धान्ने ।
बावजूद कट जाने के कालोनियां
खड़ी हॆं जो कतार में अगले चुनाव की
नियमित होने को ।

ऒर वे तमाम पेड़ भी
जिनके पास
आज भी इतिहास हॆ
अपनी छायाओं के ।