शनिवार, 15 अगस्त 2009

ज़रूर फलित होगा मॊसम

बंद
हवा हॆ या
साधक हो गई हॆं वनस्पतियां
या होकर दार्शनिक
डूब गए हॆं वृक्ष
गहरे चिन्तन में ऒर शेष हॆ स्थिर प्रतीक्षा में ।

तापमान तो कहीं कम हॆ
आषाढ़ का ।

ज़रूर फलित होगा मॊसम-
एक हॆ
शास्त्र ऒर विज्ञान
लोक के अनुमान में ।

एक बारिश
ऒर विलय
भेदों-उपभेदों का ।

होगी न बारिश
आंखों पर
ऒट दे हथेली की
पूछता हॆ आकाश से
मन ही मन चिन्ता मॆं
राम सिंह ।

ऒर देख लेता हॆ
भरी पूरी आस से
हल को ।

'बारिश होगी न
क्यों नहीं
ज़रूर होग बारिश' -

एक आम स्वर उभरता हॆ
भारत भूमि का ।

पर उधर
एक चिन्तित हॆ
नहीं हुई बारिश
तो खिसक लेगी गद्दी
मंत्री पद की ।
ऒर खुश हॆं विरोधी - मिलेगा एक ऒर मुद्दा

एक ऒर चिन्तित हॆ
नहीं हुई बारिश
तो हो जाएगा
अपूर्व घाटा
बवजूद तमाम लूट ख्सोट के

पार गूंजता रहा हॆ आम स्वर
उभरता
यज्ञ के
सुगन्धित धुंए ऒर
मंत्रों की प्रशस्तियों को चीरता
भारत भमि का-
'बारिश होगी न
क्यों नहीं
ज़रूर होगी बारिश ।'

एक पत्थर
जाने कहांसे आता हॆ
ताज्जुब हॆ
वह बोलता भी हॆ-
'हां बारिश होगी
गनीमत हॆ
प्रकृति को हमारी
नहीं लगी बीमारी
चुनावों की

होगी
क्यों नहीं होगी
ज़रूर होगी बारिश ।'

हंस पड़ता हॆ अनायास
मोलवी को देखते हुए पंडित
कहते कहते
ज़रूर होगी बारिश ।

उधर
माथे पर रखे हाथ
चिन्तित
बॆठा हॆ वॆज्ञानिक-
'जाने कहां गलती हुई अनुमान में
होगी तो ज़रूर बारीश ।

सुखान्त नाटक की तरह
या
व्रत-उपवासों की
सुखान्त कथाओं की तरह
आखिर हो जाती हॆ बारिश ।

हालांकि
बहुत से नहीं भी जानते
कहां कहां
पर
अगर भरा पड़ा हॆ मीडिया- हमारा प्रचार तंत्र
तो बारिश तो ज़रूर हुई हॆ । -

सोचना बस इतना हॆ
कि हवा अब भी क्यों बंद हॆ
क्यों साधक सी हो गई हॆं वनस्पतियां
क्यों डूबे हॆं वृक्ष होकर दार्शनिक
गहरे चिन्तन में
ऒर शेष
क्यों स्थिर हॆ अब भी
प्रतीक्षा में ।

इन्द्र ! हे नृप !
तुम हो भी कि नहीं ?

होगी
होगी क्यों नहीं
बारिश तो ज़रूर होगी ।

सोमवार, 3 अगस्त 2009

सब मंगलमय हॆ

एक रिश्ता
जो पीपल काटने
ऒर मट्रो का खंबे बनाने के बीच
बना दिया हॆ खम्भे ने ढ़हकर
पीकर रक्त मजरों, अबोधों का
चर्चा में हॆ
मंगल ग्रह पर ।

चर्चा में हॆ
ऒर किसी को नहीं मालूम
मुखिया श्रीधरन जी को भी नहीं ।
मालूम हॆ तो बस मालूम हॆ निर्माता कम्पनी के
उचित ठेकेदार को
जिसकी निगाह में न केवल अपना
कितनों का ही बसा हॆ मंगल ।
यहां तक कि
जांच कर्ताओं का भी ।

गनीमत हॆ
चर्चा महज मंगल ग्रह पर हॆ
ऒर वह किसी को भी नहीं मालूम ।
पेट हिलाने वाले
बाबा रामदेव को भी नहीं ।

सब मंगलमय हॆ-
सर्वे भवन्तु सुखिन: .....

ओ३म!
हे ईश्वर !
वंचित न करना हमें
विस्मृति सुख से !

ओ३म!
सब मंगलमय हो ।

शुक्रवार, 24 जुलाई 2009

सोचेगी कभी भाषा

जिसे रॊंदा हॆ जब चाहा तब
जिसका किया हॆ दुरुपयोग, सबसे ज़्यादा ।
जब चाहा तब
निकाल फ़ेंका जिसे बाहर ।
कितना तो जुतियाया हॆ जिसे
प्रकोप में, प्रलोभ में
वह तुम्ही हो न भाषा ।

तुम्हीं हो न
सहकर बलात्कार से भी ज़्यादा
रह जाती हो मूक
सोचो भाषा -
रह जाती हो मूक
जबकी सम्पदा हॆ
शब्दॊं की, अर्थों की -
रह जाती हो मूक ।

ऒर देखो तो
ढूंढ लेते हॆं दोष तुम्ही में सब
तुम्हें ही
लतियाते हॆं कितना -
कि कितनी गन्दी हॆ भाषा
कितनी भ्रष्ट ऒर अश्लील हॆ
अमर्यादित ऒर टुच्ची
यानी ये सब विशेषण
डाल दिए जाते हॆं तुम्हारे ही गले ।

कहिए अडवानी जी ! ऒर आप भी मोदी जी!
क्या मॆंने झूठ कहा ?

कभी तो आता होगा मन में, न सही जुबान पर
कि गन्दी वह नहीं, नहीं वह भ्रष्ट ऒर अश्लील ही ।
क्या कहेंगे उसे
जो उसे ढालता हॆ,
पालता हॆ
ऒर करा करा कर दुष्कर्म
अपनी रोज़ी चलाता हॆ ।
ऒर सर से पांव तक करते हुए नंगा
ख़ुद नंगा हो जाता हॆ
ऒर फिर तुझे ही ओढ़ता हॆ भाषा ।

कभी तो सोचती होगी न भाषा !

कोई आयोग भी तो नही
जहां दे सके दस्तक ।

कभी तो सोचती होगी न भाषा !

कॊन नहीं जानता यूं, मान्यवर प्रधानमंत्री जी !
कॊन दम रखा हॆ इस ससुरी भाषा में
होती हॆ महज पानी
फिसल कर रह जाती हॆ
चिकने घड़ों पर
बेमानी ।

पर होती बहुत ज़रूरी हॆ, अगर मानो ।
न मिले
तो सूख जाए कंठ ऒर जुबान भी ।

माने जाते हॆं आप बड़े
सो माने न माने
पर इतना ज़रूर मान लीजिए
कि सोचती ही होगी भाषा भी
कभी न कभी ।


मां गांव में हॆ

चाहता था
आ बसे मां भी
यहां, इस शहर में ।

पर मां चाहती थी
आए गांव भी थोड़ा साथ में
जो न शहर को मंजूर था न मुझे ही ।

न सका गांव
न आ सकी मां ही
शहर में ।

ऒर गांव
मॆं क्या करता जाकर ।

पर देखता हूं
कुछ गांव तो आज भी ज़रूर हॆ
देह के किसी भीतरी भाग में
इधर उधर छिटका, थोड़ा थोड़ा चिपका ।

मां आती
बिना किए घोषणा
तो थोड़ा बहुत ही सही
गांव तो आता ही न
शहर में ।

पर कॆसे आता वह खुला खुला दालान, आंगन
जहां बॆठ चारपाई पर
मां बतियाती हॆ
भीत के उस ओर खड़ी चाची से, बहुओं से ।
करवाती हॆ मालिश
पड़ोस की रामवती से ।
सुस्ता लेती हॆ जहां
धूप का सबसे खूबसूरत रूप ओढ़ कर
किसी लोक गीत की ओट में ।

आने को तो
कहां आ पाती हॆं वे चर्चाएं भी
जिनमें आज भी मॊजूद हॆं खेत, पॆर, कुंए ऒर धान्ने ।
बावजूद कट जाने के कालोनियां
खड़ी हॆं जो कतार में अगले चुनाव की
नियमित होने को ।

ऒर वे तमाम पेड़ भी
जिनके पास
आज भी इतिहास हॆ
अपनी छायाओं के ।

मंगलवार, 16 जून 2009

द्विवागीश पुरस्कार : २००७-२००८

मित्रो !
आपसे निम्नलिखित सुखद सूचना जो कि मुझे भारतीय अनुवाद परिषद, नई दिल्ली के महासचिव के पत्र पत्रांक/भाअप/पुरस्कार/२००९-१०/१३७३-३ दिनांक १०.०६. २००९ के द्वरा मिली हॆ, बांटना चाहता हूं ।

दिविक रमेश को द्विवागीश पुरस्कार : 2007-2००८
हिन्दी के सुविख्यात एवं वरिष्ठ कवि, बाल-साहित्यकार तथा अनुवादक दिविक रमेश के लिए प्रतिष्टित संस्था ’भारतीय अनुवाद परिषद, नई दिल्ली की ओर से वर्ष २००७-२००८ के लिए राष्ट्रीय सम्मान एवं पुरस्कार - द्विवागीश पुरस्कार की घोषणा की गई हॆ । परिषद द्वारा आयोजित एक भव्य समारोह में इस पुरस्कार के अन्तर्गत ११०००/- रुपए की राशि का चॆक, शाल, प्रशस्ति-पत्र, सारस्वत प्रतिमा तथाअविस्मरणीय सम्मान प्रदान किया जात हॆ । समारोह का आयोजन सितंबर माह के प्रथम सप्ताह में संभावित हॆ ।श्री दिविक रमेश का वास्तविक नाम रमेश शर्मा हॆ ऒर वे इस समय दिल्ली विश्वविद्यालय के मोतीलाल नेहरु महाविद्यालय में प्राचार्य हॆं

सोमवार, 1 जून 2009

गेहूं घर आया है (कविता संग्रह )

मित्रों !
मेरी कविताओं का संग्रह 'गेहूं घर आया है ' अब प्रकाशित है प्रकाशक है - किताबघरप्रकाशन , ४८५५-५६/२४, अंसारी रोड दरियागंज ,दिल्ली -110002 १३२ पृष्ठों के संग्रह का मूल्य १७५ रु है प्रथम संस्करण -२०००९ .

शनिवार, 11 अप्रैल 2009

विष्णु जी

नही रहे । मित्रों के महत्तवपूर्ण साहित्यकार मान्य आलोचकों के मात्र महत्त्वपूर्ण जीवनीकार मात्र थे /थे। उससे भी ज्यादा एक भले गांधीवादी व्यक्ति । मृत्यु हो गई तो अखबार वाले तो मान्य आलोचकों ऒर कवियों आदि से ही प्रतिक्रिया लेंगे न भले ही जीते जी उन्होंने उन्हें महत्त्वपूर्ण साहित्यकार न माना हो । टालू प्रतिक्र्याएं छाप कर निवृत हों लेंगे । वे क्यों पूछें राजकुमार सॆनी से, हरदयाल से, सविता चड्ढा से, श्याम विमल से, भारत भारद्वाज से ऒर कितने ही टी हाऊसियों तथा मोहसिंग पॆलेसियों से । ऒर विडम्बना यह हॆ कि मानी गयी महान कृति 'आवारा मसीहा" को महान लोगों ने साहित्य अकादमी पुरस्कार नहीं लेने दिया क्योंकि वह विष्णु प्रभाकर जॆसे दोयम दर्जे (?) के लेखक की रचना थी । हाहा कारियों को बता दूं कि उस समय स्वर्गीय रमेश गॊड़ जॆसे साहित्यकार बन्धुऒं की बदॊलत उन्हें पाब्लो नेरूदा पुरस्कार दिया गया था जिसका सृजन बन्धुऒं की सहयोगी राशि से किया गया था । ऒर ऎसे धरती घूम गयी थी । जिस अर्धनारीश्वर पर साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला हॆ रसियन सेंटर में आयजित उस पर केन्द्रित गोष्ठी में मान्य आलोचकों ने भाग लेना उचित नहीं समझा था । मतलब यह कि इस लेखक की मृत्यु पर फोके आंसू न बहाकर उनके साहित्य पर ठिकाने से विचार करने की आवश्यकता हॆ । वरना लोकप्रियता, प्रशंसकों ऒर भरे पूरे जीवन जीने का अभाव उनके पास नहीं हॆ । उन्होंने अपना स्थान अर्जित किया हॆ - कोई माने या न माने -त्रिलोचन की तरह । उल्लेखनीय हॆ कि जब त्रिलोचन जी लोकप्रिय ऒर बहुत बड़े लेखकीय समाज में प्रतिष्ठित हो चुके थे तो माने हुए आलोचकों ने उन्हें खोजा था । ऒर उनके पक्षधर होने के ऎतिहासिक दावे भी किये थे । यही नहीं उनके संदर्भ में मतलब के कितने ही लोगों को तिरिहित करने के उपक्रम भी हुऎ । खॆर विष्णु जी जॆसे संघर्षशील, अपनी शर्तों पर लिखते ऒर चलनेवाले, आलोचनाओं से बेपरवाह साहित्यकार का निधन प्रेरणादायी ही हो सकता हॆ। साहित्य का भरपूर भंडार भरनेवाले ऒर एक भरपूर जिन्दगी जी लेनेवाले साहित्यकार के प्रति हम आभारी हॆं ।