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सोमवार, 7 दिसंबर 2009

आखिरी फूल
दिविक रमेश

कुछ बेहिसाब फूलों के लिए
उसने हाथ फॆलाया
उसके हाथ की रेखाएं
ढ़ेरों ढ़ेर फूलों में तब्दील हो गयीं

इतने फूलों को वह कॆसे बंद करता
कॆसे सड़ने देता मुट्ठी में

उसने उन्हें आकाश में उछाल दिया
चंद ग्वार बच्चे इसी ताक में थे
हंसते हंसते
बीनने लगे फूल धरती से ।

सिर्फ एक बच्चा था
बाहों को कमर पर बांधे
जो घूर रहा था ।
उसकी पोरों में बंद आखिरी फूल को
इत्मीनान से देख रहा था ।

बोला-
’यह फुल मुझे दो न ?’

वह चुप ।

’यह फूल मुझे दो न ?’
बच्चा फिर बोला ।

’क्यों, तुमने धरती से क्यों नहीं बीना ?’
उसने पूछा ।

’दो मुझे फूल’
इस बार
बदल दिया था उसने
स्थान क्रियापद का ।
एक दलित भाव
उसके चेहरे से ख़ारिज हो चुका था।

ख़ुद फूल भी हो उट्टा था उत्सुक
उसके हाथों में आने को ।

क्रमश: ।

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