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सोमवार, 3 अगस्त 2009

सब मंगलमय हॆ

एक रिश्ता
जो पीपल काटने
ऒर मट्रो का खंबे बनाने के बीच
बना दिया हॆ खम्भे ने ढ़हकर
पीकर रक्त मजरों, अबोधों का
चर्चा में हॆ
मंगल ग्रह पर ।

चर्चा में हॆ
ऒर किसी को नहीं मालूम
मुखिया श्रीधरन जी को भी नहीं ।
मालूम हॆ तो बस मालूम हॆ निर्माता कम्पनी के
उचित ठेकेदार को
जिसकी निगाह में न केवल अपना
कितनों का ही बसा हॆ मंगल ।
यहां तक कि
जांच कर्ताओं का भी ।

गनीमत हॆ
चर्चा महज मंगल ग्रह पर हॆ
ऒर वह किसी को भी नहीं मालूम ।
पेट हिलाने वाले
बाबा रामदेव को भी नहीं ।

सब मंगलमय हॆ-
सर्वे भवन्तु सुखिन: .....

ओ३म!
हे ईश्वर !
वंचित न करना हमें
विस्मृति सुख से !

ओ३म!
सब मंगलमय हो ।

7 टिप्‍पणियां:

  1. uttam 1
    anupam !

    मालूम हॆ तो बस मालूम हॆ निर्माता कम्पनी के
    उचित ठेकेदार को
    जिसकी निगाह में न केवल अपना
    कितनों का ही बसा हॆ मंगल ।
    यहां तक कि
    जांच कर्ताओं का भी ।

    aapne sab kuchh kah diya sankshipt shabdon me....
    abhinandan !

    उत्तर देंहटाएं
  2. Adarneeya Divik ji,
    achchhee samsamyik kavita ke liye hardik badhai.
    punah anurodh hai ki apane kuchh balgeet mere bachchon vale blog Fulbagiya ke liye bhej den to kripa hogee.
    shubhkamnaon ke sath.
    HemantKumar

    उत्तर देंहटाएं
  3. आदरणीय दिविक जी,आप का ब्लाग मैंने पढ़ा,आपकी कवितायेँ समसामयिक संवेदना का दस्तावेजहैं,बात मेट्रो हादसा की हो,भाषा की हो या फिर माँके संवेदनशील रिश्ते की कवितायेँ असर कारी हैं.अपने बहुत पुराने मित्रों को ब्लाग पर देख कर बहुत प्रसन्नता हो रही है.बधाई. 9818032913,

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  4. मंगल का बहुआयामी चित्रण
    मन का मंगल तिलक कर गया।

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  5. कविता पढ़कर दिल्ली के मेट्रो -हादसा के बारे में याद ताजा हो आई .
    एक ठेकेदार किस तरह अपने उपरवालों को खुश करने के लिए घटिया माल उपयोग में लाता है .
    बहुत ही सुंदर प्रस्तुती !

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  6. शुक्र है रमेश कि तुम मंगलवाद के सतही चक्कर में नहीं फंसे. कविता में निहित डन्क ही इसकी शक्ति है. तात्कालिकता का दबाव अक्सर कविता को ले डूबता है. यहां यह दुर्घटना नहीं हुई.

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  7. एक रिश्ता
    जो पीपल काटने
    ऒर मट्रो का खंबे बनाने के बीच
    बना दिया हॆ खम्भे ने ढ़हकर
    पीकर रक्त मजरों, अबोधों का

    बहुत खुशी हुई । जैसी उम्मीद है वैसी रचना पढ़ने को मिली । कितना कुछ कह दिया आपने ।

    आपका शिष्य
    त्रिपुरारि कुमार शर्मा

    tanhafalak.blogspot.com

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