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शुक्रवार, 24 जुलाई 2009

सोचेगी कभी भाषा

जिसे रॊंदा हॆ जब चाहा तब
जिसका किया हॆ दुरुपयोग, सबसे ज़्यादा ।
जब चाहा तब
निकाल फ़ेंका जिसे बाहर ।
कितना तो जुतियाया हॆ जिसे
प्रकोप में, प्रलोभ में
वह तुम्ही हो न भाषा ।

तुम्हीं हो न
सहकर बलात्कार से भी ज़्यादा
रह जाती हो मूक
सोचो भाषा -
रह जाती हो मूक
जबकी सम्पदा हॆ
शब्दॊं की, अर्थों की -
रह जाती हो मूक ।

ऒर देखो तो
ढूंढ लेते हॆं दोष तुम्ही में सब
तुम्हें ही
लतियाते हॆं कितना -
कि कितनी गन्दी हॆ भाषा
कितनी भ्रष्ट ऒर अश्लील हॆ
अमर्यादित ऒर टुच्ची
यानी ये सब विशेषण
डाल दिए जाते हॆं तुम्हारे ही गले ।

कहिए अडवानी जी ! ऒर आप भी मोदी जी!
क्या मॆंने झूठ कहा ?

कभी तो आता होगा मन में, न सही जुबान पर
कि गन्दी वह नहीं, नहीं वह भ्रष्ट ऒर अश्लील ही ।
क्या कहेंगे उसे
जो उसे ढालता हॆ,
पालता हॆ
ऒर करा करा कर दुष्कर्म
अपनी रोज़ी चलाता हॆ ।
ऒर सर से पांव तक करते हुए नंगा
ख़ुद नंगा हो जाता हॆ
ऒर फिर तुझे ही ओढ़ता हॆ भाषा ।

कभी तो सोचती होगी न भाषा !

कोई आयोग भी तो नही
जहां दे सके दस्तक ।

कभी तो सोचती होगी न भाषा !

कॊन नहीं जानता यूं, मान्यवर प्रधानमंत्री जी !
कॊन दम रखा हॆ इस ससुरी भाषा में
होती हॆ महज पानी
फिसल कर रह जाती हॆ
चिकने घड़ों पर
बेमानी ।

पर होती बहुत ज़रूरी हॆ, अगर मानो ।
न मिले
तो सूख जाए कंठ ऒर जुबान भी ।

माने जाते हॆं आप बड़े
सो माने न माने
पर इतना ज़रूर मान लीजिए
कि सोचती ही होगी भाषा भी
कभी न कभी ।


1 टिप्पणी:

  1. सोचो भाषा -
    रह जाती हो मूक
    जबकी सम्पदा हॆ
    शब्दॊं की, अर्थों की -
    ===
    भाषा सर्वथा समर्थ है. पर भाषा के द्वारा ही हो रहा अनर्थ है. कभी कभी तो भाषा खुद अपरिभाषित नज़र आती है.
    बहुत खूब लिखा है.

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