मित्रो !
आपसे निम्नलिखित सुखद सूचना जो कि मुझे भारतीय अनुवाद परिषद, नई दिल्ली के महासचिव के पत्र पत्रांक/भाअप/पुरस्कार/२००९-१०/१३७३-३ दिनांक १०.०६. २००९ के द्वरा मिली हॆ, बांटना चाहता हूं ।
दिविक रमेश को द्विवागीश पुरस्कार : 2007-2००८
हिन्दी के सुविख्यात एवं वरिष्ठ कवि, बाल-साहित्यकार तथा अनुवादक दिविक रमेश के लिए प्रतिष्टित संस्था ’भारतीय अनुवाद परिषद, नई दिल्ली की ओर से वर्ष २००७-२००८ के लिए राष्ट्रीय सम्मान एवं पुरस्कार - द्विवागीश पुरस्कार की घोषणा की गई हॆ । परिषद द्वारा आयोजित एक भव्य समारोह में इस पुरस्कार के अन्तर्गत ११०००/- रुपए की राशि का चॆक, शाल, प्रशस्ति-पत्र, सारस्वत प्रतिमा तथाअविस्मरणीय सम्मान प्रदान किया जात हॆ । समारोह का आयोजन सितंबर माह के प्रथम सप्ताह में संभावित हॆ ।श्री दिविक रमेश का वास्तविक नाम रमेश शर्मा हॆ ऒर वे इस समय दिल्ली विश्वविद्यालय के मोतीलाल नेहरु महाविद्यालय में प्राचार्य हॆं
मंगलवार, 16 जून 2009
सोमवार, 1 जून 2009
गेहूं घर आया है (कविता संग्रह )
मित्रों !
मेरी कविताओं का संग्रह 'गेहूं घर आया है ' अब प्रकाशित है प्रकाशक है - किताबघरप्रकाशन , ४८५५-५६/२४, अंसारी रोड दरियागंज ,दिल्ली -110002 १३२ पृष्ठों के संग्रह का मूल्य १७५ रु है प्रथम संस्करण -२०००९ .
मेरी कविताओं का संग्रह 'गेहूं घर आया है ' अब प्रकाशित है प्रकाशक है - किताबघरप्रकाशन , ४८५५-५६/२४, अंसारी रोड दरियागंज ,दिल्ली -110002 १३२ पृष्ठों के संग्रह का मूल्य १७५ रु है प्रथम संस्करण -२०००९ .
शनिवार, 11 अप्रैल 2009
विष्णु जी
नही रहे । मित्रों के महत्तवपूर्ण साहित्यकार मान्य आलोचकों के मात्र महत्त्वपूर्ण जीवनीकार मात्र थे /थे। उससे भी ज्यादा एक भले गांधीवादी व्यक्ति । मृत्यु हो गई तो अखबार वाले तो मान्य आलोचकों ऒर कवियों आदि से ही प्रतिक्रिया लेंगे न भले ही जीते जी उन्होंने उन्हें महत्त्वपूर्ण साहित्यकार न माना हो । टालू प्रतिक्र्याएं छाप कर निवृत हों लेंगे । वे क्यों पूछें राजकुमार सॆनी से, हरदयाल से, सविता चड्ढा से, श्याम विमल से, भारत भारद्वाज से ऒर कितने ही टी हाऊसियों तथा मोहसिंग पॆलेसियों से । ऒर विडम्बना यह हॆ कि मानी गयी महान कृति 'आवारा मसीहा" को महान लोगों ने साहित्य अकादमी पुरस्कार नहीं लेने दिया क्योंकि वह विष्णु प्रभाकर जॆसे दोयम दर्जे (?) के लेखक की रचना थी । हाहा कारियों को बता दूं कि उस समय स्वर्गीय रमेश गॊड़ जॆसे साहित्यकार बन्धुऒं की बदॊलत उन्हें पाब्लो नेरूदा पुरस्कार दिया गया था जिसका सृजन बन्धुऒं की सहयोगी राशि से किया गया था । ऒर ऎसे धरती घूम गयी थी । जिस अर्धनारीश्वर पर साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला हॆ रसियन सेंटर में आयजित उस पर केन्द्रित गोष्ठी में मान्य आलोचकों ने भाग लेना उचित नहीं समझा था । मतलब यह कि इस लेखक की मृत्यु पर फोके आंसू न बहाकर उनके साहित्य पर ठिकाने से विचार करने की आवश्यकता हॆ । वरना लोकप्रियता, प्रशंसकों ऒर भरे पूरे जीवन जीने का अभाव उनके पास नहीं हॆ । उन्होंने अपना स्थान अर्जित किया हॆ - कोई माने या न माने -त्रिलोचन की तरह । उल्लेखनीय हॆ कि जब त्रिलोचन जी लोकप्रिय ऒर बहुत बड़े लेखकीय समाज में प्रतिष्ठित हो चुके थे तो माने हुए आलोचकों ने उन्हें खोजा था । ऒर उनके पक्षधर होने के ऎतिहासिक दावे भी किये थे । यही नहीं उनके संदर्भ में मतलब के कितने ही लोगों को तिरिहित करने के उपक्रम भी हुऎ । खॆर विष्णु जी जॆसे संघर्षशील, अपनी शर्तों पर लिखते ऒर चलनेवाले, आलोचनाओं से बेपरवाह साहित्यकार का निधन प्रेरणादायी ही हो सकता हॆ। साहित्य का भरपूर भंडार भरनेवाले ऒर एक भरपूर जिन्दगी जी लेनेवाले साहित्यकार के प्रति हम आभारी हॆं ।
रविवार, 29 मार्च 2009
बेटी ब्याही गई हॆ
बेटी ब्याही गई हॆ
बेटी ब्याही गई हॆ
गंगा नहा लिए हॆं माता-पिता
पिता आश्वस्त हॆं स्वर्ग के लिये
कमाया हॆ कन्यादान क पुण्य ।
ऒर बॆटी ?
पिता निहार रहे हॆं, ललकते से
निहार रहे हॆं वह कमरा जो बेटी का हॆ कि था
निहार रहे हॆं वह बिस्तर जो बेटी का हॆ कि था
निहार रहे हॆं वह कुर्सी, वह मेज़
वह अलमारी
जो बंद हॆ
पर रखी हॆं जिनमें किताबें बेटी की
ऒर वह अलमारी भी
जो बंद हॆ
पर रखे हॆं कितने ही पुराने कपड़े बेटी के ।
पिता निहार रहे हॆं ।
ऒर मां निहार रही हॆ पिता को ।
जानती हॆ पर टाल रही हॆ
नहीं चाहती पूछना
कि क्यों निहार रहे हॆं पिता ।
कड़ा करना ही होगा जी
कहना ही होगा
कि अब धीरे धीरे
ले जानी चाइहे चीज़ें
घर अपने बेटी को
कर देना चाहिए कमरा खाली
कि काम आ सके ।
पर जानती हॆ मां
कि कहना चाहिए उसे भी
धीरे धीरे
पिता को ।
टाल रहे हॆं पिता भी
जानते हुए भी
कि कमरा तोकरना ही होगा खाली
बेटी को
पर टाल रहे हॆं
टाल रहे हॆं कुछ ऎसे प्रश्न
जो हों भले ही बिन आवाज
पर उठते होंगे मनमे ं
ब्याही बेटियों के ।
सोचते हॆं
कितनी भली होती हॆं बेटियां
कि आंखों तक आए प्रश्नों को
खुद ही धो लेती हॆं
ऒर वे भी असल में टाल रही होती हॆं ।
टाल रही होती हॆं
इसलिए तो भली भी होती हॆं ।
सच में तो
टाल रहा होता हॆ घर भर ही ।
कितने डरे होते हॆं सब
ऎसे प्रश्नों से भी
जिनके यूं तय होते हॆं उत्तर
जिन पर प्रश्न भी नहीं करता कोई ।
मां जानती हॆ
ऒर पिता भी
कि ब्याह के बाद
मां अब मेहमान होती हॆ
अपने ही उस घर में
जिसमें पिता,मां ऒर भाई रहते हॆं ।
मां जानती हॆ
कि उसी की तरह
बेटी भी शुरु शुरु में
पालतू गाय सी
जाना चाहेगी
अब तक रह चुके अपने कमरे ।
जानना चाहेगी
कहां गया उसका बिस्तर।
कहां गई उसकी जगह ।
घर करते हुए हीले हवाले
समझा देगा धीरे धीरे
कि अब
तुम भी मेहमान हो बेटी
कि बॆठो बॆठक में
ऒर फिर ज़रूरत हो
तो आराम करो
किसी के भी कमर में ।
मां जानती हॆ
जानते पिता भी हॆं
कि भली हॆ बेटी
जो नहीं करेगी उजागर
ऒर टाल देगी
तमाम प्रश्नों को ।
पर क्यों
सोचते हॆं पिता ।
बेटी ब्याही गई हॆ
गंगा नहा लिए हॆं माता-पिता
पिता आश्वस्त हॆं स्वर्ग के लिये
कमाया हॆ कन्यादान क पुण्य ।
ऒर बॆटी ?
पिता निहार रहे हॆं, ललकते से
निहार रहे हॆं वह कमरा जो बेटी का हॆ कि था
निहार रहे हॆं वह बिस्तर जो बेटी का हॆ कि था
निहार रहे हॆं वह कुर्सी, वह मेज़
वह अलमारी
जो बंद हॆ
पर रखी हॆं जिनमें किताबें बेटी की
ऒर वह अलमारी भी
जो बंद हॆ
पर रखे हॆं कितने ही पुराने कपड़े बेटी के ।
पिता निहार रहे हॆं ।
ऒर मां निहार रही हॆ पिता को ।
जानती हॆ पर टाल रही हॆ
नहीं चाहती पूछना
कि क्यों निहार रहे हॆं पिता ।
कड़ा करना ही होगा जी
कहना ही होगा
कि अब धीरे धीरे
ले जानी चाइहे चीज़ें
घर अपने बेटी को
कर देना चाहिए कमरा खाली
कि काम आ सके ।
पर जानती हॆ मां
कि कहना चाहिए उसे भी
धीरे धीरे
पिता को ।
टाल रहे हॆं पिता भी
जानते हुए भी
कि कमरा तोकरना ही होगा खाली
बेटी को
पर टाल रहे हॆं
टाल रहे हॆं कुछ ऎसे प्रश्न
जो हों भले ही बिन आवाज
पर उठते होंगे मनमे ं
ब्याही बेटियों के ।
सोचते हॆं
कितनी भली होती हॆं बेटियां
कि आंखों तक आए प्रश्नों को
खुद ही धो लेती हॆं
ऒर वे भी असल में टाल रही होती हॆं ।
टाल रही होती हॆं
इसलिए तो भली भी होती हॆं ।
सच में तो
टाल रहा होता हॆ घर भर ही ।
कितने डरे होते हॆं सब
ऎसे प्रश्नों से भी
जिनके यूं तय होते हॆं उत्तर
जिन पर प्रश्न भी नहीं करता कोई ।
मां जानती हॆ
ऒर पिता भी
कि ब्याह के बाद
मां अब मेहमान होती हॆ
अपने ही उस घर में
जिसमें पिता,मां ऒर भाई रहते हॆं ।
मां जानती हॆ
कि उसी की तरह
बेटी भी शुरु शुरु में
पालतू गाय सी
जाना चाहेगी
अब तक रह चुके अपने कमरे ।
जानना चाहेगी
कहां गया उसका बिस्तर।
कहां गई उसकी जगह ।
घर करते हुए हीले हवाले
समझा देगा धीरे धीरे
कि अब
तुम भी मेहमान हो बेटी
कि बॆठो बॆठक में
ऒर फिर ज़रूरत हो
तो आराम करो
किसी के भी कमर में ।
मां जानती हॆ
जानते पिता भी हॆं
कि भली हॆ बेटी
जो नहीं करेगी उजागर
ऒर टाल देगी
तमाम प्रश्नों को ।
पर क्यों
सोचते हॆं पिता ।
शनिवार, 21 मार्च 2009
कविता
मेरे भी हाथों में
मॆं
अंगूठा छाप
होश तक नहीं जिसे
बढे हुए नाखूनों का
पीढ़ी दर पीढ़ी
रह रहा हॆ जो
शरणों में आपकी....
मॆं....
मॆं तो बस इतना भर जानता हूं
कि कल तक मॆं
नहीं जी पा रहा था अपनी जिन्दगी।
कि कल तक मॆं
डर रहा था इसी जिनावर से
जो अब ख़ुद डर रहा हॆ मुझसे ।
कि कल तक मॆं
नहीं ले पा रहा था फल
अपने ही बिरछ का।
जाने क्या चमत्कार हुआ
जाने कहां समाया था यह ज़ोर
कि दिल चाहे हॆ
रख लूं हाथ
आज आपके कंधों पर।
कोई ख़ॊप ही नहीं रहा ।
नहीं जानता
कॆसे कब किसने थमाया था यह
मेरे हाथों में ।
पर जानता हूं अब
ऒर पूरे होशो हवास में
कि लट्ठ अब
मेरे भी हाथों में हॆ ।
मॆं
अंगूठा छाप
होश तक नहीं जिसे
बढे हुए नाखूनों का
पीढ़ी दर पीढ़ी
रह रहा हॆ जो
शरणों में आपकी....
मॆं....
मॆं तो बस इतना भर जानता हूं
कि कल तक मॆं
नहीं जी पा रहा था अपनी जिन्दगी।
कि कल तक मॆं
डर रहा था इसी जिनावर से
जो अब ख़ुद डर रहा हॆ मुझसे ।
कि कल तक मॆं
नहीं ले पा रहा था फल
अपने ही बिरछ का।
जाने क्या चमत्कार हुआ
जाने कहां समाया था यह ज़ोर
कि दिल चाहे हॆ
रख लूं हाथ
आज आपके कंधों पर।
कोई ख़ॊप ही नहीं रहा ।
नहीं जानता
कॆसे कब किसने थमाया था यह
मेरे हाथों में ।
पर जानता हूं अब
ऒर पूरे होशो हवास में
कि लट्ठ अब
मेरे भी हाथों में हॆ ।
कविता
पूछ लूं
यह जो उमड़ रहा हॆ तूफान
मेरा हॆ
उपजा हो भले ही
वहीं से
सोचा जा रहा हॆ जहां से ।
कभी कभार आती हॆ समझ बहुत देर से भी
कि विजयी होती हॆ जब अप्सरा इन्द्र की
तो नहीं होती वह हार विश्वामित्र ।की
ऒर होती हॆ हार अगर मेनका की
तो नहीं होती जीत किसी की भी
बस होती हॆ हार भर ।
मॊका हो तो पूछ लूं
भले ही खुद से
कि पीटता हॆ जब मर्द अपनी ऒरत को
तो मामला क्यों नहीं हो जाता ऒरतों का
जॆसे होता हॆ आतंक जब मुम्बई में
तो मामला क्यों नहीं हो जाता पूरी पृथ्वी का
कि जब हत्या की जाती हॆ एक आदमी की
तो मामला क्यों नहीं हो जाता पूरी मानवता का ।
यह जो उमड़ रहा हॆ तूफान
मेरा हॆ
उपजा हो भले ही
वहीं से
सोचा जा रहा हॆ जहां से ।
कभी कभार आती हॆ समझ बहुत देर से भी
कि विजयी होती हॆ जब अप्सरा इन्द्र की
तो नहीं होती वह हार विश्वामित्र ।की
ऒर होती हॆ हार अगर मेनका की
तो नहीं होती जीत किसी की भी
बस होती हॆ हार भर ।
मॊका हो तो पूछ लूं
भले ही खुद से
कि पीटता हॆ जब मर्द अपनी ऒरत को
तो मामला क्यों नहीं हो जाता ऒरतों का
जॆसे होता हॆ आतंक जब मुम्बई में
तो मामला क्यों नहीं हो जाता पूरी पृथ्वी का
कि जब हत्या की जाती हॆ एक आदमी की
तो मामला क्यों नहीं हो जाता पूरी मानवता का ।
कविता
करना प्रतीक्षा
क्या सचमुच
होती हॆं मजबूत दूरियां
समय की
स्थान की ।
क्या सचमुच
नहीं खुलने देती द्वार
ऒर खिड़कियां भी
बन कर आड़ ।
तब भी
इतना तो नहीं न हो पाती समर्थ दुरियां
कि छीन ले
फड़फड़ाहट
अगर हॆ शेष वह पंखों में ।
करना
ज़रूर करना
प्रतीक्षा मेरी ।
एक प्रतीक्षा
जॆसे होती हॆ
ऒर बस होती हॆ ।
नहीं होने दूंगा खत्म
यह फड़फड़ाहट अपने पंखों की
जड़ें जिसकी हॆं मेरी आत्मा तक ।
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