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सोमवार, 6 जुलाई 2015


(कोई कोई अनुभव हम में सचमुच नई ऊर्जा भर जाता है और अविस्मरणीय भी हो जाता है।हालांकि निजी अनुभव है फिर भी बांटने का मन हो रहा है, पहले ही क्षमा मांग लेता हूं।
आज सुबह फोन आया। नम्बर फीड नहीं था। फोन मैं जरूर उठाता हूं।महिला की आवाज थी। बहुत ही आत्मीय।पता चलने पर कि मैं अर्थात दिविक रमेश ही फोन पर है उन्होंने बताया कि वे पद्मा सचदेव हैं और उन्होंने मेरा नम्बर चित्रा मुदगल से लिया है।उनसे मिलना तो कई बार हुआ है लेकिन फोन पहली बार आया था। सो बहुत ही सुखद लग रहा था। आगे अभी और सुखद विस्फोट होना था। बताया आज ही उन्होंने नवनीत के ताजा अंक में कश्मीर स॔ंबंधी मेरा संस्मराणत्मक यात्रावृत्त पढ़ा है जो उन्हें बहुत ही मार्मिक लगा और बेहद पसन्द आया था। इतना पसन्द आया था कि वे खुद को रोक नहीं सकी थीं। कितना सार्थक होना लग रहा था ! इस आयु में भी! शाम होते होते ऐसे ही भाव लिए एक और फोन आया---बालवाटिका के सम्पादक भैरूलाल गर्ग जी का। भीग गया। कैसे मानूं कि लिखा पढ़ा नहीं जा रहा। नवनीत अभी मेरे हाथ नहीं आयी है। उत्सुकता और भी बढ़ गयी है।क्या यह स्वाभाविक है।)

 प्रस्तुत हॆ सम्पूर्ण यात्रावृत्त

शायद ही कोई भारतीय हो जो कम से कम एक बार कश्मीर की यात्रा कर लेना चाहता हो। कश्मीर की खूबसूरती का वर्णन ही इतना मिलता हॆ। ऊपर से एक समय तो ऎसा रहा हॆ कि हर दूसरी फिल्म में कश्मीर के दर्शन सुलभ रहे हॆं। उन्हीं दिनों की बात हॆ। सन 1981 की। लेखक होने के नाते जम्मू ऒर कश्मीर के कुछ लेखकों से परिचय था ही। सो उनकी मदद से इन दोनों स्थानॊं की यात्रा सुग होगी, भरोसा था। यूं भी किसी स्थान पर कोई जानकार रहता हो तो वहां की यात्रा करते समय मेरा जॆसा व्यक्ति बहुत सुरक्षित महसूस करता हॆ। कुछ साहित्यिक होने जाने का सुख अलग। इसलिए किसी स्थान के लिए चलने से पहले वहां रहने वाले परिचितो  (चाहे उनसे कभी न भी मिला हूं) को टटोलता हूं।
      17 जुलाई 1981 की शाम को शिमला में अपर्णा की ओर से आयोजित दो दिवसीय गोष्ठी में सम्मिलित होकर श्री जगदीश चतुर्वेदी के साथ दिल्ली लॊट आया था। इसी दिन की रात की रेलगाड़ी से सपरिवार जम्मू के लिए रवाना हो गया। एल.टी. सी. की सुविधा की तहत। 18 जुलाई, 1981 की सुबह 11 बजे गाड़ी जम्मू तवी के स्टेशन पर आ लगी। प्लेटफॉर्म पर उतरते ही कुलबीर पराशर हमारी बाट जोहते नज़र आ गए। वे आजकल एस.ए.एस. की ट्रेनिंग के लिए दिल्ली से वहां आए हुए थे। दिल्ली से ही मेरे परिचित थे। एक अच्छे अभिनेता के रूप में भी। पता चला कि हमारे ठहरने का प्रबंध डाक बंगले में किया गया था। कुछ विशेष ढंग का व्यवहार पाकर एक अतिरिक्त सुख से भर जाने की कमजोरी शायद हर व्यक्ति में होती हॆ जिसका अनुभव मुझे भी हुआ। टॆक्सी से डाक बंगले पहुंचे। पाया जम्मू के दो स्थानीय साहित्यकार जिनमें एक का नाम राजकुमार था, प्रतीक्षा रत थे। इनसे कभी आपस में मिलना नहीं हुआ था। एक-दूसरे को खास खोजी निगाहों से देख रहे थे। एक न पूछा--;आप दिविक रमेश हॆं? पूछने के ढंग से समझ गया था कि वे भाई रमेश मेहता के भेजे हुए थे ऒर ’हिन्दी युवा लेखक संघ’ की ओर से हमें लेने आए थे।  रमेश मेहता जम्मू कश्मीर सरकार की आर्ट एन्ड कल्चर संस्था की पत्रिका शीराजा के संपादक थे जिनसे मेरा पत्र-व्यवहार था। साहित्यकारों ने बताया कि हमारे ठहरने की व्यव्स्था वस्तुत: एम.एल.ए. हॉस्टल में की गई हॆ। उसी टेक्सी से हम गन्तव्य स्थल पर पहुंच गए। श्री रमेश मेहता भी आ गए। उनसे आमने-सामने का मिलन पहली बार हो रहा था। सामान कमरे में रख दिया गया था। चायपान हुआ। इसके बाद हम सभी शहर की ओर भोजने के लिए निकल पड़े। भोजन के लिए प्रसिद्ध लक्ष्मी ढाबे में, जहां की विशेष रूप से कढ़ी ऒर राजमा तो अत्यंत प्रसिद्ध हॆं, भोजन लिया गया। आवभगत से सहज ही अभिभूत था। शाम को ’हिन्दी युवा लेखक संघ’ की ओर से उसी के कार्यालय में ’कवि-गोष्ठी’ रखी गई थी। विश्राम के लिए  कुलबीर पराशर हमें हॉस्टल पहुंचाकर अपने घर चला गया था। शाम की गोष्ठी में उसे भी सम्मिलित होना था। हमें गोष्ठी में ले जाने के लिए शाम को एक युवा कवि आ गया था। अच्छा लगा था।क्यो? शायद अपने रचनाकार को रेखांकित होने के एहसास से। इसे कमजोरी कहूं या सहजता, अभी निर्णय नहीं कर पाया हूं।
      जम्मू के प्रसिद्ध लेखक ओम गुप्ता की अध्यक्षता में कवि-गोष्ठी प्रारम्भ हुई। संचालन की कमान युवा कवि-नवगीतकार श्री निर्मल ’विनोद’ के हाथ में थी। एक बड़ी संख्या में स्थानीय पुरुष ऒर महिला कवियों ने भागीदारी की थी। मुझे विशिष्ट आनन्द मिला था। आनन्द के साथ अपने विश्राम स्थल पर लॊट आए थे। कल( 19 जुलाई, 1981) सुबह हवाई जहाज से श्रीनगर जाना था।
      सुबह-सुबह, सारे सामान के साथ, जम्मू हवाई-अड्डे पर पहुंच गए थे। खासा उत्साह था हम सबमें। मेरे ऒर मेरे परिवार के लिए हवाई जहाज से यात्रा करने का यह पहला अवसर था। दूसरे अपने सपनों के स्थान कश्मीर भी तो पहली ही बार जा रहे थे। बच्चे तो हवाई जहाज में बॆठने के लिए सबसे ज्यादा लालायित नज़र आ रहे थे। एयर इंडिया का हवाई जहाज दिल्ली से आना था।
      करीब चालीस मिनट के बाद हम श्रीनगर हवाई अड्डे पर थे। पहले ही तय कार्यक्रम के अनुसार, टॆक्सी लेकर हम टूरिस्ट सेंटर पहुंचे जहां कश्मीरी कवि ऒर पी०डब्ल्यू०ए० के जनरल सॆक्टरी शामलाल परदेसी अपने छोटे भाई पुष्कर के साथ हमारे स्वागत में मॊजूद थे। वहां से वे हमें ज़ीरो ब्रिज ले गए। वहीं उन्होंने एक मुस्लिम परिवार के घर पर हमारे ठहरने की व्यवस्था की थी। बहुत कम किराए पर। परिवार के सदस्य बहुत ही अच्छे ऒर आत्मीय भाव से भरे लगे। हमें बहुत ही प्रेम-भाव के साथ लिपटन चाय ऒर बिस्कुट दिए। भूख भी जग ही चुकी थी।
      थोड़ा तॆयार होकर हम शामलाल जी ऒर उनके भाई के साथ डल झील की ओर गए। नई जगह पर अपने जानकारों की उपस्थिति कितना बेफिक्र कर देती हॆ, इसका अनुभव हो रहा था।  डल झील का आनन्द उठाने के लिए, कश्मीरी जुबान में बात करके, शामलाल जी ने हमारे लिए एक शिकारा ठीक कर दिया था। नाव में तो पहले भी बॆठ चुके थे लेकिन शिकारे में बॆठने का यह पहला मॊका हाथ लगा था। सोचा तो समझा कि सजी हुई नाव ही को तो शिकारा कहा जाता हॆ। मन में विचार आया कि कहीं मछलियों का शिकार पर निकली नाव को तो शिकारा नाम नहीं दिया गया था, लेकिन चुप ही रहा। कॊन भाषाविज्ञान के सागर में उतरे। यूं भी इतनी विशाल, खूबसूरत ऒर मन ही मन चुलबुलाहट भरे गीत गुनगुनाती झील की विशाल बाहुपाश को छोड़कर।
      शिकारा वाला हमारे परिवार को लेकर चला ऒर नेहरू पार्क तथा कबूतर खाना तक घुमाकर वापस ले आया। यह क्या? जहां वापस आए वह तो डलझील में बना ’हाऊसबोट’ था। पता चला कि हाऊसबोट शामलाल जी के एक परिचित का था। शामलाल जी वहां मॊजूद थे ही। वे कश्मीरी में अपने उस परिचित से बात कर रहे थे। कुछ ही देर बाद उन्होंने बताया कि उस ज़ाज नामक हाऊसबोट में उन्होंने एक रात के लिए हमारे ठहरने की व्यवस्था कर दी थी। उनके अनुसार प्रकृतिक सॊन्दर्य अपनी लगह हॆ, लेकिन कश्मीर आओ ऒर हाऊसबोट में रहने तथा शिकारा में विहार करने का लुत्फ न उठाओ तो मज़ा अधूरा माना जाता हॆ। हाऊसबोट के बारे में सुन तो रक्खा ही था सो अब उसका साक्षात अनुभव लेने का भी बढ़िया अवसर था। मुस्लिम परिवार क्या सोचेगा, यह जरूर मन में आ रहा था। ऒर उस परिवार की वह प्यारी सी बच्ची चांद! पर यहां आकर बच्चे बहुत खुश थे। इसलिए ऒर भी अधिक कि यहां शॊचालय भी आधुनिक ढ़ंग के थे जबकि मुस्लुम घर में पुराने जमाने का टाट वाला पाखाना बना हुआ था। श्रीनगर में शेष समय अब हाऊसबोट पर ही बिताना तय हो गया था, भले ही हमारे लिए वह थोड़ा मंहगा था। हाऊसबोट बहुत ही खूबसूरत था। कश्मीरी कारिगिरी का नमूना! अखरोट की लकड़ी का फर्नीचर। कमरे में सब प्रकार की सुविधाएं। सजा हुआ ड्राइंगरूम। भोजन के लिए खूबसूरत डाइनिंग रूम। ऊपर बॆठ कर दूर दूर तक डल झील के जल से बतियाने को छत। दोनों ओर हाऊसबोटों की कतारें। अद्भुत ही लगा था सबकुछ। पानी के बीच रहने की कल्पना ऒर सड़क तक शिकारों की सहायता से पहुंचने की कल्पना ने ही हमें तो गुदगुदा रखा था। पहली रात शामलाल जी भी इसी हाऊसबोट पर रहे। एक मदभरी शाम-रात में कविताओं का सुनना-सुनाना तो बनता ही था, सो बना। बहुत ही खूबसूरत बल्कि कहूं कश्मीरी अनुभव रहा।
      अगले दिन अर्थात 20 जुलाई, 1981 को हमारा  कार्यक्रम शालीमार ऒर निशात(मुगल) गार्डन्स देखने का था। वहां बसों-स्कूटरों से भी जाया जा सकता था लेकिन हमें बताया गया कि मज़ा शिकारा से जाने में हॆ। शिकारा वाले काफी पॆसा मांग रहे थे। हमारे हाऊसबोट वाले ने ही एक शिकारा वाले को बुलाकर, जॆसे-तॆसे’ 35 रुपयों में पूरा घुमाना तय करा दिया। 35 रुपए भी यूं हमारे बजट के हिसाब से कम रकम नहीं थी। शाम के लगभग 4 बजे हमारी शिकारा-यात्रा आरम्भ हुई।
      सबसे पहले नेहरू पार्क आया जिसे हम पहले ही देख चुके थे। यह डल गेट से आगे पहला पड़ाव था जहां रुकने की हमें आवश्यकता नहीं थी। यह छोटा सा पार्क हॆ जो डल झील में हॆ जिसमें एक कॆफेटेरिया भी हॆ। शिमला के रिज़ (ridge) जॆसा एक गुम्मद भी। लोग यहां बॆठते हें, सुस्ताते हॆं ऒर फोटो ‘उठाते’ हॆं। फोटो खींचने के लिए कश्मीर में ’उठाना’ शब्द चलता हॆ जॆसे कई जगह ’उतारना’ चलता हॆ। हमने यह भी जाना था कि ठहरने के लिए वहां ’बॆठना’ शब्द प्रचलित था। मसलन किसी को कहना हो -यहां ठहरिए या रुकिए तो सुनने को मिलेगा यहां बॆठिए। नेहरू पार्क के साथ डल का पाट काफी चॊड़ा हो जाता हॆ ऒर यहां मोटरबोट पर भी सॆर की जा सकती थी। थोड़ी ही दूर पर तख्तों की सहायता से बने तरणताल भी बने दिखे थे। ऒर थोड़ी ही दूर पर कुदरत की बहुत ही खूबसूरत ऒर रोमांचक रचना ऊंचे-ऊंचे पहाड़ अपनी बांहे फॆलाए अपनी गोद में चढ़ाने को उत्सुक नजर आ रहे थे। पास से कोई मोटरबोट निकलती तो उसके कारण बनी शारारत भरी लहरों पर हमारा शिकारा मस्ती से झूम उठता ऒर हम हिचकोलों के अनोखे आनन्द में डूब जाते। ऎसे समय में मल्लाह खास ढ़ग से अपने शिकारा को बचाते हॆं ऒर कभी -कभार यात्रियों का ढांढस भी बंधाते हॆं। अक्सर मोटरबोट वाले कम गति से ही चलाते हॆं वर्ना शिकारा उलट ही जाए। शिकारे वाले ने बताया कि फिल्म की काफी शूटिंग्स उसी क्षेत्र में होती हॆं। वहीं से उसने गवर्नर हाऊस भी दिखाया ऒर श्रीनगर का एक विशाल होटल भी। दायीं ओर की पहाड़ी के बिल्कुल ऊपर स्थित शंकराचार्य के पुरातन मंदिर ऒर थोड़े नीचे की ओर टेलीविजन टॉवर को भी देखा। दर्शन ऒर दूरदर्शन का मेल।
      नेहरू पार्क से थोड़ा आगे ही एक स्थल हॆ जिसे कबूतर खाना नाम दिया गया हॆ। पता चला कि वहां जो गेस्ट हाऊस हॆ  वह बहुत ही खास लोगों के लिए खोला जाता हॆ। प्रकृति जहां अपना सर्वस्व लुटाने में कोई खासो-आम का भेद नहीं कर रही थी वहीं आदमी का पूरी शिद्द्त के साथ दिया गया भेद-भाव वाला दखल थोड़ी खटास दे गया। ध्यान बांटा उसी से लगे कमल के फूलों के खेत ने। चारों ओर लोहे के कांटॊं की बाड़ से घिरा था। पीले-पीले रंग के सुरम्य फूल अभी खिले हुए थे। शाम होते-होते ये बंद होने लगेंगे।
      शिकारा छप-छप की अपनी धुन में आगे बढ़ रहा था। लग रहा था जॆसे अपने कश्मीर के वॆभव से खिले हमारे मन देखकर उसकी चाल गर्व से भर गई थी। दोनों मल्लाह बीच-बीच में थोड़ा-बहुत बोल लेते थे। आस-पास दूसरे शिकारा भी चल रहे थे।  कुछ शिकारा-दुकाने भी दिखीं जिनसे बिस्कुट, खुबानी, आम, ढंडे पेय, विस्की आदि बहुत सा सामान खरीदा जा सकता था। कुछ सब्जी वाले शिकारे भी थे। ये ज्यादा सजे हुए नहीं होते।छतें जरूर होती हॆं जिनपर कपड़ा नहीं चढ़ाया होता। शिकारा वालों के पास प्राय: एक-एक हुक्का भी देखा। साधारण सी दिखने वाली नांवों में आते आदमी देखे तो हमारे मल्लाह ने बताया कि वे काम से लॊट रहे थे। पानी की दुनिया का वह एक अजब ऒर  खूबसूरत दृश्य था। महिला हो, बच्चा हो, बूढ़ा हो, जवान हो--कोई भी हो, अपनी-अपनी नाव को आसानी से खेते हुए चले जाता हॆ। ये नाव को नाव के अगले कोण पर बॆठ कर खेते हॆं।
      थोड़ी ही दूर जाने पर ’चार चिनार’ नाम का अद्भुत स्थान आता हॆ। जल के बीचोंबीच, एक चॊकोर की रचना करते हुए चिनार के चार पेड़ खड़े दिखते हॆं। इसे छोटा-सा टापू कहा जा सकता हॆ। यहां एक सरकारी कॆफे भी हॆ। इस स्थान पर थोड़ी देर रुके ऒर दूर-दूर तक निगाहे फॆला लीं। चलने को हुए तो मल्लाहों ने बताया कि ऒर थोड़ी देर रुकना होगा क्योंकि हवाएं चलने लगी हॆं।कश्मीर में  ’चिनार’ पेड़ की शाखाएं काटना कानूनीतॊर पर मना हॆ, यह जानकारी भी मिली।
      हवा कम हुई तो फिर जल में उतरे ऒर आगे बढ़े। पानी का वही विशाल पाट फिर उपस्थित था। चश्मेशाही मोड़ को किनारे छोड़ते हुए हम लोग ’निसात’ की ओर बढ़ रहे थे। एक पुलनुमा चीज़ के नीचे से निकल कर हम पानी के उस हिस्से में पहुंच गए थे जो निसात झील के नाम से पुकारा जाता हॆ। सामने ही तो निसात दिख रहा था।
      ’निसात’ पर उतरे। मल्लाहों को शिकारा इसी घाट पर लगाना था। निसात से हमें पहले शालीमार बसे से जाने के लिए बताया गया था ऒर लॊट कर निसात देखते हुए शिकारा की वापसी यात्रा करनी थी। काफी दुकाने थीं यहां। पर्यटकों को ध्यान में रखते हुए। टॆक्सी स्टॆण्ड भी था। मल्लाहों ने चाय-पानी के लिए पॆसे भी मांग ही लिए थे। ’टिप’ मांगने का रिवाज यहां बहुत ज़्यादा था। कोफ्त होती थी कभी-कभी तो। भाई जब पूरा मेहनताना मिल रहा हॆ तो ’टिप’ क्यों? खॆर, बहस कॊन करता?
      बस लेकर शालीमार पहुंच गए। पिंजॊर गार्डन (शिमला के पास) की सी शॆली का लगा लेकिन थोड़ा अन्तर लिए। यहां फलों के वृक्ष थे।  ठिगने-ठिगने पेड़ों पर कच्चे सेब लगे हुए थे। बच्चोँ ने एक-दो तोड़े भी। बीचों-बीच पानी की नहर बतियाती चल रही थी। कहीं-कहीं पहाड़ से, किसी चश्में से पानी चुहलबाजियां करता चला आता था। एक विश्राम स्थल-सा भी दिखा जिसमें पुराने ढ़ंग की चित्रकारी देखने को मिली। वापसी में निसात की झलक लेते हुए घाट पर लॊट आए थे जहां हमारा शिकारा प्रतीक्षारत था। समय भी तो काफी हो चुका था। 
      हाऊसबोट की ओर रवाना हुए तो पाया कि अंधकार झील पर पूरा पसर चुका था ऒर झील का रूप बहुत ही विकराल नजर आ रहा था। जहां लम्बी-लम्बी घास आई वह स्थल तो बहुत ही खॊफनाक लगा था। एकदम सुनसान में चलते हुए शिकारा पर आध्यात्मिकता छाने लगी थी। कभी-कभार, काम से लॊट रहे किसी जन का शिकारा दिख जाता तो जान में जान आती। खॆर, हाऊसबोट पहुंचे तो मानो जन्नत में भटकी जन्नत मिल गई थी। शामलाल जी का छोटा भाई अशोक वहीं हमारी राह देख रहा था।
      शिकारे वाले को जब तय राशि देने लगा तो उसने ज़्यादा की मांग रख दी। मॆंने मना किया तो उसने विवाद किया। आशोक बीच में पड़े। उन दोनों में कश्मीरी में कुछ बहस हुई। थोड़ी देर बाद अशोक ने नाविक को तय राशि ही देने को कहा जो मॆंने सहर्ष दे दी। नाविक के जाने के बाद अशोक ने बहुत ही दिलचस्प बात बताई। उसने बताया, "नाविक नहीं जानता था कि मॆं आप लोगों का परिचित हूं। इसलिए जब मॆंने उससे (नाविक से) ज्यादा पॆसों को लेकर बात की तो उसने कहा-तू भी कश्मीरी, मॆं भी कश्मीरी, तेरी जेब से क्या जाता हॆ। जब मॆंने बताया कि आप मेरे भाई हॆं तो वह तय पॆसे लेने को मान गया। " सुनकर मुझे हंसी ही आई थी।
      शामलाल परदेसी जी ने श्रीनगर के रेडियो स्टेशन पर मेरी कविताओं की रिकार्डिंग की भी व्यवस्था कराई थी। रेडियो स्टेशन पर उन दिनों मोहन निराश थे जिन्होंने बहुत ही आत्मीय भाव से मेरी कविताएं रिकार्ड की थी। कॊन सी कविताएं रिकार्ड करायी थीं, अब याद नहीं हॆं।
कितने ही सालों बाद कवि अग्निशेखर ने याद कराया था कि मॆंने अपनी कविता ’चिड़िया का ब्याह’ भी सुनाई थी जो उन्हें आज भी बहुत प्रिय हॆ। यह कविता बाद में चलकर बहुत ही प्रसिद्ध हुई थी। मोहन निराश स्वयं कवि थे ऒर बाद में उनके पुत्र उपेन्द्र रॆना भी रेडियो से जुड़े थे। अग्निशेखर जी से, यह संस्मरण लिखते समय वाट्स अप पर बात हुई तो ऒर राज खुले जिनसे आप भी रू-ब-रू होइये:
 " [06/01 22:46] Agnishekhar: अग्निशेखर जी! 1981 में सपरिवार कश्मीर की यात्रा की थी। मोहन निराश जी ने रेडियो के लिए कविताएं भी रिकार्ड की थीं। याद नहीं कौनसी। आपने कुछ पहले मेरी कविता चिड़िया का ब्याह की याद करायी थी। क्या संदर्भ बता सकेंगे? यात्रा संस्मरण लिख रहा हूं।
[06/01 22:46] Agnishekhar: Aadarneey Bhai Divik Ramesh ji, jahan tak mujhe yaad hai Radio kashmir Srinagar se prasarit Hindi Sahityik karyakram "VIVIDHA" se aapki do kavitayen prasarit hui theen ..Swayam Mohan Nirash ji ne prasaran poorv bhi mujhse Abhibhoot hokar aapki recorded dono kavotaon ki charcha hi nahi ki thee balki agrah kiya tha ki main apne kashmiri va Urdu ke sathi
[06/01 22:46] Agnishekhar: (Jaari )
[06/01 22:47] Agnishekhar: kaviyon ko bhi "VIVIDHA" se prasarit hone wale Divik Ramesh ke kavya - paath ko sune..ek sambandhit Radio karykram nishpadak ke naate hi nahi apitu swayam ek kavi ke naate bhi ve aapki dono kavitson se khush the..
[06/01 22:47] Agnishekhar: Jahan tak ki meri smriti mei us kavita vishesh ka kendriy bimb ankit hai usme Kavi ne Chidiya ke vivah ki baat karte huye sahajta aur saadagi ke moolyon ke manush - jeewan se vilupt hote jaane ke baraks Chidiyon ke naisargik jeewan ko prateek swaroop kendriyta dee thee..shayad aisa hi kuchh thaa..
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( अग्निशेखरआदरणीय भाई दिविक रमेश जी, जहाँ तक मुझे याद है रेडियो कश्मीर श्रीनगर से प्रसारित हिंदी साहित्यिक कार्यक्रम  "विविधा" से आपकी दो कविताएं प्रसारित हुई थीं। ..स्वयं मोहन निराश जी ने प्रसारण पूर्व भी मुझसे अभिभूत होकर आपकी रिकोर्डिड दोनों  कविताओं कि चर्चा ही नहीं की बल्कि आग्रह किया था कि मॆं अपने कश्मीरी वा उर्दू के साथी कवियों को भी "विविधा" से प्रसारित होने वाले दिविक रमेश के काव्य-पाठ को सुनें...एक संबंधित रेडियो कार्यक्रम निष्पादक के नाते ही नहीं अपितु स्वयं एक कवि के नाते भी वे आपकी दोनों कविताओं से खुश थे। जहां तक की मेरी स्मृति में उस कविता विशेष का केन्द्रीय बिम्ब अंकित हॆ उसमें कवि ने चिड़िया के विवाह की बात करते हुए सहजता ऒर सादगी के मूल्यों के मानुष-जीवन से विलुप्त होते जाने के बरक्स चिड़ियाओं के नॆसर्गिक जीवन को प्रतीक स्वरूप केन्द्रियता दी थी...शायद ऎसा ही कुछ था।) "
   अगले दिन हम आशोक के साथ, अनन्तनाग जिले में स्थित उसके गांव खरबरारी के लिए बस से रवाना हो गए। मूलत: मॆं दिल्ली के एक गांव से हूं सो गांव का एक बिम्ब मेरे मन में बसा था जिसे खरबरारी पहुंचकर ध्वस्त होना था। बस अनन्तनाग तक थी। सोचा अनन्तनाग की भी झलक ले ली जाए।  यहां एक प्रसिद्ध मंदिर में हमारा बिस्तर-सामान रखवा दिया गया। मंदिर के पास ही मस्जिद ऒर गुरुद्वारा देखा तो लगा कि यह वहां की एक  विशिष्टता कही जानी चाहिए। पता चला कि अनन्तनाग में अनन्त चश्में हॆं इसलिए इस स्थान का नाम अनन्त नाग पड़ा। जब बहुत सी इमारतों पर इस स्थान का नाम ’इस्लामाबाद’ लिखा देखा तो सहज ही चॊंका था ऒर पाकिस्तानी दखलनदाजी का अनुमान लगाया था। सरकारी कागजों में नि:संदेह वह स्थान अनन्तनाग ही था। बस की यात्रा में दो शब्दों ने खास ध्यान खींचा था, वे थे- पाकसे हे ऒर रोकसे हे। चलने के लिए ’पाकसे’ शब्द का प्रयोग अनूठा लगा था। 
      अनन्तनाग से गांव के लिए बस पकड़कर हमने आगे की यात्रा शुरु की। केसर के खेत दूर से देखने को मिले। एक स्थान पर बस ने उतार दिया था। वहां से शामलाल जी के गांव तक पॆदल ही पहुंचना था। लगा जॆसे किसी हरे सागर के बीचोंबीच आ गए थे। चारों ओर इतने हरेभरे खेत ऒर अपार हरियाली देख कर भीतर-बाहर हरे हो लिए थे। सामने की पहाड़ियां बर्फ से लदी पड़ी थीं। आसपास सेबों के कितने ही बाग। यह हम कहां आ गए थे! पृथ्वी थी या स्वर्ग!
      शामलाल जी कश्मीरी पंडित थे। उनके गांव में पंडितों के घर एक-दो ही थे, शेष मुस्लमानों के थे। उनका घर बड़ा-सा था जिसका आंगन भी काफी बड़ा था जिसमें अखरोट ऒर चिनार के पेड थे। चश्मा था ऒर छोटी सी नहरनुमा नदी के दूसरी ओर उनके सेब के बाग थे। मॆंने’क्रियापद ’थे’ का क्यों प्रयोग किया हॆ इसका राज थोड़ी देर बाद खोलूंगा। यही क्रियापद ’थे’ हॆ जो एक दर्द समोए हुए हॆ। खॆर। कश्मीरी गांव के परिवार के साथ रहने पर कितना कुछ मिला, कितना कुछ सीखा इसका विस्तार से वर्णन करना तो कठिन लग रहा हॆ। वहां घर में मेहमान को दरवाजे के पास वाले स्थान पर नहीं बॆठाया जाता क्योंकि उसे मेहमान के सम्मान के अनुकूल नहीं समझा जाता। मेहमानों के खाने के बाद ही घर के लोग भोजन करते हॆ। मेहमानों के भोजन करते समय घर के लोग आसपास बॆठकर परोसने ऒर भोजन के लिए आग्रह करने का काम करते हॆं। सुबह के समय चश्मे के पास सिरचुट ऒर कहवे  का आनन्द दोगुना हो जाता हॆ। शामलाल जी ने आसपास के कुछ कवियों को भी बुला लिया था जिनमें एक मंगल थे। बच्चे तो सेब के पेड़ॊ की टहनियों पर ही जा चढ़े थे।
      एक-दो अनुभव तो ऎसे हुए जो शायद कभी नहीं भूलेंगे। हमने जब खुमानियां खानी चाहीं तो गांव का एक मुस्लमान युवक भाई खुमानियों से लदी एक टहनी ही तोड़ लाया ऒर प्यार से आग्रह कर कर के खुमानियां खिलाई थीं।  इसी प्रकार गांव से थोड़ी दूर एक झरने को देखने का कार्यक्रम बनाया गया। वहां तांगे से जाना था। शामलाल जी साथ थे ही। उन्होंने सुझाया कि पहले एक ओर जगह भी होते चलें। तांगा उस ओर ले जाने के लिए कहा गया। लेकिन घोड़े को न जाने क्या सूझा, वह अड़ गया। जॆसे ही उस ओर चलने के लिए उसे हांका जाता वह अगले दो पॆर ऊपर कर लेता। कई बार ऎसा हुआ। हम हंसते-हंसते लोट-पोट थे। आखिर झरने की ओर ही चले। अब घोड़ा मानो मन की बात पूरी हो जाने से बेहद खुश था। झरना बहुत ही खूबसूरत था। लग कृत्रिम रहा था। वहां भी शामलाल जी के मुस्लिम मित्रों ने कहवे आदि का प्रबंध किया हुआ था। मॆंने नोट किया कि मुस्लिम मित्र भी भाई कह कर संबोधित करते हॆं। ऒर ऎसा कहते समय घुटनों पर हाथ भी मारते हॆं। यह क्रिया सामान्य थी या खास, नहीं जानता।  शामलाल जी स्कूल में अध्यापक थे ऒर प्रगतिशील विचारों के थे। राजनीति में भी उनकी दिलचस्पी थी। उन्होंने बताया था कि कश्मीर के समृद्ध हिन्दू ब्राह्मणॊं ने एक समय में गरीब मुस्लिम मजदूरों का बहुत शोषण किया था।वे शोषण के खिलाफ थे। बाद में तो दिल्ली ऒर बाद में नोएडा आने पर वे मेरे घर पर भी ठहरते थे। उन्होंने मेरी कविताऒं के कश्मीरी में अनुवाद भी किए। मसलों को लेकर गम्भीर लेकिन हंसमुख थे। ’थे’ क्रियापद अब भी अखर रहा हॆ।
      एक ऎसा समय आया कि उनका खत उनके गांव से न आकर दूसरे पते से आया। पता जम्मू की किसी बस्ती का था। पता चला कि शामलाल परदेसी जी बेघर हो गए थे। वही कश्मीर के बिगड़े हुए हालातों के कारण। अन्य हिन्दुओं की तरह उन्हें भी अपने परिवार के साथ अपनी प्रिय जन्मस्थली, अपना घर-गांव छोड़ना पड़ा ऒर एक भरे-पूरे परिवार को लेकर जम्मू के दो छोटे कमरों के फ्लॆट में रहने को विवश होना पड़ा। मित्र ऒर कवि की इस जानकारी ने मुझे भीतर तक हिला दिया ऒर दर्द के चश्में से कविता फूट पड़ी --दूसरे पते पर लिखने का दर्द। कविता मेरे तीसरे संग्रह ’हल्दी चावल ऒर अन्य कविताएं’(अनुपलब्ध) तथा मेरे दो संग्रहों के समवेत संग्रह ’फूल तब भी खिला होता’ में संकलित हॆ। कदाचित अपनी प्रगतिशील सोच के बावजूद अपनी भूमि से जबरन प्रवासी हो जाने के कारण हुई अपनी असमय की अकस्मात मत्यु से पहले  वे मेरे घर आए थे ऒर मेरे मुंह से यह कविता सुनी थी। कविता सुन कर उनकी आंखें गीली हुई थीं ऒर उन्होंने मुझे गले से लगाया था। आज भी वह समय वहीं का वहीं ठहरा हुआ हॆ। इसके बाद न मॆं कभी कश्मीर जा पाया ऒर न ही ’थे’ हो चुका मेरा अग्रज मित्र शामलाल ही सशरीर दर्शन दे सका। कविता यूं हॆ-
दूसरे पत पर लिखने का दर्द

मॆंने तुम्हें खत लिखा था, परदेसी भाई
लॊट आया है
आपके या आपके परिवार के
ठिकाने पर न होने की इत्तला लेकर।

यह खत
पहला नहीं, जो लॊटा हॆ
कई ऒर भी लॊट चुके हें पहले
बस एक ही खबर लिए
कोई नहीं मिला ठिकाने प्र, ताला बंद था।
ऎसे तो नहीं थे तुम, परदेसी भाई!

कितना नया हॆ यह अनुभव मेरे लिए।

आज भी आँखों में बसा हॆ तुम्हारा गाँव
गाँव का तुम्हारा घर, आँगन
आँगन के विशाल अखरोट-वृक्ष
ऒर आशीर्वादी मुद्रा में खड़ा चिनार भी
ऒर हाँ
चिनार के पास से ही
मचलती,कूदती-सी वह शरारती नदी,
दूर-दूर तक फॆले तुम्हारे सेबों के बाग भी।

मेरी आँखों में ज्यों-का-त्यों बंधा हे वह दृश्य-
तुमने उठा-उठाकर गोदे में मेरे बच्चों को
कहा था
लो तोड़ो, ढ़ेर सारे तोड़ो सेब, ये सब तुम्हारे हॆं
ऒर मॆदान से आए मेरे बच्चे
ऒर वे ही नहीं, खुद हम भी
कितनी आसानी से चढ़ गए थे
आसमान के कंधों पर।

क्या नाम था उसका शायद ...गुलाम..कुछ ऎसा ही
गुलाम भाई
जो तोड़ लाया था
कन्धे पर
खुमानियों से भरा टहना ही--
कितने आग्रह से खिलाया था,
वापसी पर
छोड़ने भी आया था अनन्तनाग तक।

मुझे नहीं भूली हॆं
रह-रहकर याद आती हें
वे तमाम बातें
कश्मीर से कन्याकुमारी तक
अपने में संजोए
वे तमाम तमाम बातें
जिन्हें अक्सर हम
चश्मे के पास किया करते थे
वहीं तो ले आती थी भाभी
सिरचुट ऒर कहवा भी।

पर तुम्हें लिखे अपने पत्रों की वापसी पर
अखबार पढ़ते-पढ़ते
बेहद चॊंक रहा हूं मित्र!
करता रहा हूं तसल्ली
हर बार
नोटबुक देखकर।
हर बार
यही तो दिखा हॆ पता--
गाँव खरबरारी, पू बुगाम, अनन्तनाग।

आज जब
पहली बार--एक तरह से पहली बार
आया हे तुम्हारा खत
जम्मू की किसी कॉलोनी से
तो लग रहा हॆ
क्यों आया हॆ तुम्हारा खत
बुरी तरह भीगा हुआ, अटा हुआ कुछ-कुछ।

आखिर क्यों लिखा हॆ तुमने
कि पता नहीं कभी
फिर हो भी सकेगा कि नहीं
तुम्हारा वही पता, वही ठिकाना
जिस पर
खत लिखने की आदत हॆ मुझे।
बडा मुश्किल हॆ न
बढ़ती हुई उम्र में, आदत का बदल देना
ऒर आदतें भी जबकि
हमारी बहुत अपनी होकर रही हों
जिन्हें याद किया हो, चूमा हो हमारे दोस्तों ने भी।

परदेसी भाई!
क्या याद हॆ तुम्हें
मॆंने पूछा था
कि कुछ लोग
क्यों बदलकर बोल रहे थे
अनन्तनाग का नाम--
तुम चुप रह गए थे,
इशारे से, चुप मुझे भी करा दिया था
खचाखच भरी बस में।

तुम्हारा पत बदल जाने का
मुझे दु:ख हॆ पऱदेसी भाई
ठीक जॆसे दु:ख होता हॆ
माँ के साथ हुए
बलात्कार की खबर पाकर।

नहीं
कोई ऒर शब्द चुनना होगा
दु:ख की जगह
कोई ऒर
एक मजबूत शब्द
परदेसी भाई!

खॆर
तुमने निमन्त्रण भेजा हॆ बिटिया के ब्याह का
मॆं महसूस कर सकता हूं
कितना रोए होगे, कितना रोए होगे दोस्त
जब लिखना पड़ा होगा कोने पर
’कितने अरमान थे, बिटिया के ब्याह के, पर...’
ऒर छोड़ दिया होगा वाक्य अधूरा ही।

मॆं सोच सकता हूं
तुम बेचॆन हुए होगे
बार-बार समेटा होगा तुमने
ऊँगलियों ऒर अँगूठों को
बार-बार
बार-बार।
      यात्रा तो हमने पहलगाम, गुलमर्ग आदि स्थानों की भी की थी लेकिन वहां के बारे में, विस्तार से, फिर कभी।  हालात जब काफी प्रतिकूल हुए अर्थात भयावह तो पहलागाम की यात्रा को याद करते हुए एक ऒर कविता लिखी गई थी -"कहाँ हॆ पहलगाम"। फिलहाल उसे ही सांझा कर रहा हूं:
कहाँ हॆ पहलगाम
पूछिए मत       
पूरी शॆतान की नानी थी लिद्दर नदी
बर्लिन में मिली जिप्सी लड़की-सी अल्हड़
पूरी-की-पूरी उतर गई थी मुझ में
आकाश से उतर मेरी धरती पर।

पाँव डालते ही पानी में
काट ली थी
एक ठ्ठुरती चिकॊटी
शॆतान ने।

’आओ
तुम भी यहाँ बॆठो
मेरे पास इस पत्थर के वक्ष पर
ऒर डाल दो पाँव पानी में’-

हर आते-जाते को न्योतती थी
बिना भेदभाव के
लिद्दर नदी पहलगाम की।

डिढुरते पानी में टिके
पत्थर की नमी में भी
कितनी तपिश थी
किसी अपने के सामने
जी खोल देने की तरह।
कहीं कोई नहीं था वहाँ अकेला।

पूरे ब्रह्माण्ड में
हमारे होने का एक विराट उत्सव
फूटने लगा था हममें चश्मों-सा।

हद ही हो गई थी
कितनी बेशर्म हो गई थी हवाएँ अचानक
ऒर तुम कितना लजा गई थी।

याद हॆ न वह गर्मी
जो फूट गई थी
हमारे पाँवों के असावधान स्पर्श से।

पूस की रात में
हमें मिल गया था
अलाव की आँच-सा।

बात यूँ कितनी छोटी हॆ
मामूली भी
खरगोश के
फुदककर ओट में हो जाने-सी

पर सवाल होते ही
कितनी तीखी हो जाती हॆ!

हम क्या उत्तर देंगे
अगर कोई पू्छ ले
क्या चलेंगे इन छुट्टियों में
पहलगाम?

ऒर यहीं मुझे शामलाल परदेसी जी एक कविता अख़बार का भी ध्यान हो आया हॆ जिसका अनुवाद उनके साथ मिल कर किया था:
अख़बार
याद आता हे मुझे वह हँसता अख़बार
हँसता हुआ कागज
अक्षर-अक्षर खिला हुआ चेहरा, ऒर
लब्ज लब्ज से जॆसे झरती हो मिठास।

बेशुमार रंगों से भरा था वह
अंकित थे उसमें
इस धरती के खूबसूरत नक्श।
कॆसी गुडिया सी लगती थी धरती
प्यार टपकाती
बहुत खूबसूरत फुलवाड़ी।

पर जख्मी कर दिया हॆ फूलों को
किसी हवा के एक क्रूर झोके ने।
कस्तूरी हवा अब
संडांध मारती हॆ।
कीड़े चट कर गए हॆं
वह हँसता हुआ अखबार।

अब अखबार ही अखबार हॆं
सनसनाते, रोते अखबार
आग ही आग
बर्फ जम गई हॆ दिलों में
जिन्हें पढ़कर।
बदल गया हॆ
अक्षर-अक्षर का रूपाकार।

जरूर कोई बाज हॆ
समुन्द्र के पार।
अरे छ्ली!
सच कहता हूं
अब नहीं पढ़ेगा कोई यहां
इस अखबार को।
कुछ ही देर हॆ अब भोर होने में
हमारे दिल खिल उठेंगे
नए हॉकर की आवाज से।
मुख पृष्ठ पर हंसते हुए चेहरे होंगे।
दिखाऊंगा तुम्हें

फिर एक हँसता अखबार।

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