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शनिवार, 21 सितंबर 2013

वे ही हॆं कुछ

गलती हुई हड्डियां नहीं थम रही गलने से


पानी नहर का तब्दील हो रहा है कीचड़ में

आँखें उल्लुओं की सहचर हो चुकी हॆं दिन की

पाँवों ऒर हाथों की जगह

फिलहाल ’रिक्त हॆ’ की सूचनाएं गई हॆं टंग

अस्पतालों के दरवाजे ऒर बड़े ऒर सुरक्षित

ऒर अभेद्य कर दिए गए हॆं ।



सुना हॆ स्वीस बॆंकों में पड़ी रकमें सड़ांध मारने लगी हॆं ।



कितने ही चाँद रोने लगे हॆं सियारों की तरह

सूरज लंगड़ा गया हॆ ।



सुना हॆ एक देश लटक गया हॆ

आसमान के किसी तारे से लटकी रस्सी पर ।



कोई कह रहा था ऒर वह सच भी लग रहा था कि

बस अब दुनिया का अंत आ गया हॆ ।

सब घबरा गए हॆं ।



बस वे ही हॆं कुछ

जो इस बार भी गोदामों को भरने में जुट गए हॆं

बस वे ही हॆ कुछ

जो नए नए चुनाव चिन्ह खोजने में लग गए हॆं

मसलन मत्स्य, नॊका, प्रलय, मनु आदि इत्यादि ।







2 टिप्‍पणियां:

  1. वन्दन भाई
    आज जगा ही दिया मैंने
    एक सोए हुए शेर को

    एक अच्छी रचना से वंचित थी मैं

    सादर

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  2. धन्यवाद। सुखद ऒर प्रेरक।

    उत्तर देंहटाएं