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शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

आकाश से झरता लावा

राजनीति नहीं छोड़ती


अपनी माँ-बहिन को भी

जॆसे रही हॆ कहावत

कि नहीं छोड़ते कई

अपने बाप को भी ।



ताज्जुब हॆ

नदी की बाढ़ की तरह

मान लिया जाता हॆ सब जायज

ऒर रह लिया जाता हॆ शान्त ।

थोड़ा-बहुत हाहाकार भी

बह लेता हॆ

बाढ़ ही में ।



यह कॆसी कवायद हॆ

कि आकाश से झरता रहता हॆ लावा

ऒर न फर्क पड़ता हॆ

उगलती हुई पसीने की आग को

ऒर न फर्क पड़ता हॆ

राजनीति के गलियारों में

कॆद पड़ी ढंडी आहों को ।



यह कॆसी स्वीकृति हॆ

कि स्वीकृत होने लगती हॆ नपुंसकता

एक समय विशेष में

खस्सी कर दिए गए एक खास प्रधानमंत्री की ।

कि स्वीकृत होने लगती हॆं

सत्ता विरोधियों की शिखण्डी हरकतें भी ।



मोडे-संन्यासियों के इस देश में

दिशाएं मजबूर हॆं

नाचने को वारांगनाओं सी

ऒर धुत्त

बस पीट रहे हॆं तालियाँ- वाम भी अवाम भी ।



कहावत हॆ

हमाम में होते हॆं सब नंगे-

अपने भी पराए भी ।



अब चरम पर हॆ निरर्थकता

समुद्रों की, नदियों की

जाने

क्यों चाह रहा हॆ मन

कि उम्मीद बची रहे बाकी

पोखरों में, तालाबों में

ऒर एकान्त पड़ी नहरों में

झरनों में ।



जाने क्यों

दिख रही हॆ लॊ सी जलती

हिमालय की बर्फों में ।



डर हॆ

कहीं अध्यात्म तो नहीं हो रहा हूं मॆं !



हो भी जाऊं अध्यात्म

एक बार अगर जाग जाएं पत्ते वृक्षों के ।

जाग जाएं अगर निरपेक्ष पड़ी वनस्पतियाँ ।

जाग उठे अगर बांसों में सुप्त नाद ।

अगर जगा सके भरोसा अस्पताल अपनी राहों में

जख्मी हावाओं का ।

1 टिप्पणी:

  1. बहुत सुन्दर....
    गहन अर्थ लिए हुए,सार्थक अभिव्यक्ति.....

    सादर
    अनु

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