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रविवार, 11 जुलाई 2010

प्रणाम सम्पूर्ण

न सही अदृश्य या निराकार ही
तब भी करूंगा समर्पित
समस्त को
निज प्रणाम यहीं से ।

भले ही कह लें मुझे नास्तिक
पर करना हॆ मुझे अनुकरण वृक्ष का
होकर फलीभूत यहीं से
करना हॆ समर्पित
सबकुछ ।

जब भिगो सकते हॆं मेघ
वहीं से
जब महका सकते हॆं फूल
वहीं से
तो क्यों नहीं मॆं
यहीं से ।

चाहता हूं फले फूले लोक गीत
लोक में रहकर, यहीं पर ।
फले फूले जंगल, जंगल में
यहीं पर ।

चाहता हूं
मिलता रहे आशीर्वाद यहीं पर
समस्त का
जो न अदृश्य हॆ न निराकार ही ।

ऒर करता रहूं समर्पित
निज प्रणाम यहीं से
एक ऎसा प्रणाम
जो न डर हॆ न दीनता
न धर्म हॆ न हीनता ।

5 टिप्‍पणियां:

  1. चाहता हूं फले फूले लोक गीत
    लोक में रहकर, यहीं पर ।
    फले फूले जंगल, जंगल में
    यहीं पर ।
    बहुत सुन्दर इच्छा. आभार.

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  2. itni khoobsoorat baaten aastikon ko samajh mein nahin aati. ham nastik hi bhale.

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